Archive for the ‘अनुप्रिया’ Category

मेरी कहानी

समय के पन्नों में दर्ज
सारी कहानियों में
कुछ
मेरी भी हैं
दबी हुई
बेचैन सी
उम्मीदों का बोझ लादे
थककर चूर
शब्दों के कुछ ढेर गिरकर
हो गए हैं
मैले
हवाओं और धूप की पहुँच से दूर
पीले पड़ते जा रहे हैं
हरे हरे
सपने
किसी उदास चेहरे की तरह
उतर गया है
शब्दों का अर्थ
शब्द खाली आँखों से
जाने क्या टटोल रहे हैं
समय की गर्द में
एक पीड़ा सी उठती है
और
दब कर रह जाती है
एक और कहानी

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प्रेम

कितनी ही भाषाओँ में
कितने ही
तरीकों से
लिखा मैंने
प्रेम
कागज़ पर
और फिर मिटाने की कोशिश में उसे
खो दिया अपना अस्तित्व
सबसे बचाकर
छुपाकर रखा
किताबों के बीच
और एक नयी कविता उग आई पन्नों में
चूल्हे की आग में फेंकना चाहा
पर जला बैठी
अपनी ही अंगुलियाँ
सबकी नाराजगी और ताने सुनते हुए
बंद कर लिए सारे दरवाजे और खिड़कियाँ
और
ठठाकर हँसता रहा
मुझपर
प्रेम
मैं
घुप्प अंधेरों में टटोलती रही
प्रेम को
और
जुगनुओं के साथ चमकता रहा
चेहरा
प्रेम का

घर में शब्द

लिख लिख कर
मिटाती रही
अपने अनगढ़ शब्दों को
गूंथते हुए आटे को
पानी के साथ
थोड़े अबूझे शब्द भी डाले
और बनायीं शब्दों की रोटियाँ
कुछ जलीं
कुछ नर्म सी
बनाते हुए स्वेटर
बुन डाला शब्दों को सलाइयों पर
बिखर से गए
सारे डिजाईन
दिन की मेज पर लिखे शब्दों को मिटा डाला
मेरे बेटे ने
अपनी रबर से
रात के पन्नों पर लिखा
अपने मन को
सुबह डस्टबीन की आगोश में मिले
मेरे ही शब्द
घर की चौखटों पर
रंगोलियों में भरे
रंग शब्दों के
और
उग आई
एक नन्ही सी मुस्कान
शब्दों के होठों पर

उन्मुक्त


जलती धूप में
भूल आई हो
अपने सारे सपने
कहीं जल न जाएँ देखना
किसी परिंदे के पंखों को
खोंसकर अपने बालों में
बादलों के बीच
चली जाती हो
चूल्हे पर
खौलता रहता है
अदहन का पानी
तितलियों से मांगकर थोडा सा रंग
अपनी कहानियों में
भरती हो चटख रंग
जाने कब से
खटखटा रही है सांझ
तुम्हारी खिड़की
और
तुम तारों के संग हंसकर
चाय पी रही हो
तुम सिर्फ अपने भीतर ही नहीं रहती
जाने कितनी देह में
बसती हो तुम
बाहर भीतर की परिधि से मुक्त ….

तुम

यादों की गीली माटी पर
अब भी
तुम्हारे पाँव के निशान हैं
टेढ़े मेढ़े से
भागते हुए
मेरे कमरे के एक कोने में
मैंने संभालकर रखी है
तुम्हारी उजली हंसी
सबसे छुपाकर
किसी किताब के भीतर
उग आये थे तुम
शब्द बनकर
मैं दिन रात ढूंढती रहती
तुम्हारे नए नए अर्थ
कभी नाकाम
तो कभी
जीत के नए आयाम गढ़ती
दुनिया नयी हो गयी थी
और
बहुत अलग
जीवंत … .

डायरी

धुंधली सी यादों की
पीली पत्तियां
अब भी
डायरी के पन्नों के बीच
लेती हैं साँसें
खोलती हैं अपनी सारी बेचैनियाँ
और  उगते
खदबदाते शब्दों की पोटलियाँ
गुनगुने धुप सी मीठी
और सांझ की डूबती परछाइयों
के किस्से
कितने बंद दरवाजे
और खिड़कियाँ हैं
भीतर
खुलने को …
एक
आवाज सी आती है
गहरी साँसों की
डायरी से

देह



अहां हमरा गहय चाहैत छलहुँ
अपन बाँहि मे
आ हम चाहैत छलहुँ
अहाँक संग

अहाँ छूबय चाहैत छलहुँ
हमरा
आ हम अहाँक हाथ पकड़ि
पूरा करय चाहैत छलहुँ
जीवन-जतरा

हमरा लेल तेँ अहां
हमर आत्मा बनि गेल छलहुँ
मुदा अहांक लेल
हम- मात्र एकटा देह ।

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