Archive for the ‘कुमार मुकुल’ Category

सफेद चाक हूं मैं

समय की
अंधेरी
उदास सड़कों पर
जीवन की
उष्‍ण, गर्म हथेली से
घिसा जाता
सफेद चाक हूं मैं

कि
क्‍या
कभी मिटूंगा मैं

बस
अपना
नहीं रह जाउंगा

और तब

मैं नहीं

जीवन बजेगा
कुछ देर

खाली हथेली सा
डग – डग – डग .

हर चलती चीज

चेक करता हूं
तो मेल में
एक शिखंडी [ एन्‍वयमस ] मैसेज मिलता है –
कानून के हाथ लंबे होते हैं …
अब क्‍या करेंगे आप …

क्‍या करूंगा मैं
भला क्‍या कर सकता है एक रचनाकार
उजबुजाकर जूते फेंकने के सिवा

हां जूता तो फेंक ही सकता है वह
अब वह निशाने पर लगे या नहीं लगे
पर जब वह चल जाता है
तो खुद को बचा ले जाने की सारी कवायदों के बावजूद
दुनिया के इकलौते कानूनाधिपति का चेहरा
गायब हो जाता है
और जूता चला जाता है
डॉलर में बदलता हुआ

इस पूंजीप्रसूत तंत्र की
यही तो खासियत है
कि हर चलती चीज
यहां डॉलर में बदल जाती है

अब कानून के हाथ
कितने भी लंबे हो
पर जीवन बेहाथ चलता है
बेहाथ चलता है जीवन …

सोचना और करना दो क्रियाएं हैं

अंधेरा होने पर
बैट लिए बेटा आया कमरे में
तो पूछा मैंने –
क्‍या खा रहे हो यह
कुछ नहीं … कहा उसने
अच्‍छा ठीक है … मैंने कहा
ठंड है … मफलर डाल लो
उसने घूरते हुए कहा – पापा – पा पा
ओह हां
तुम्‍हें इसकी आदत नहीं
पर इसीलिए हमेशा छींकते रहते हो
ओर बाल इतने छोटे कटा लिए ठंड में
तुम कुछ समझते नहीं
ओह पापा इसीलिए तो कटवाया छोटा
कि आगे दिसंबर जनवरी में
नहीं कटाना होगा
तब ठंड ज्‍यादा रहती है
अरे हां
मैंने सोचा ही नहीं

दरअसल
सोचना और करना
दो क्रियाएं हैं
दोनों में अंतर होगा ही

लड़की जीना चाहती है

समय की धूप से संवलाई
सलोनी सी लड़की है वह
जिसकी आंखें अपने वक्‍त की पीड़ा को
असाधारण ढंग से उद़भाषित करती
छिटका देती हैं
विस्‍फारित कोरों तक
जहां वर्तमान की गर्द
लगातार
उस चमक को पीना चाहती है
पर लड़की जीना चाहती है
अनवरत

आंसू उसकी पलकों की कोरों पर
मचलते रहते हैं
संशय के दौर चलते रहते हैं
गुस्‍सा की-बोर्ड पर चलती उंगलियों के पोरों से
छिटकता रहता है
शून्‍य के परदे पर
और वह बहती रहती है
विडंबनाओं के किनारे काटती

प्‍यार – दो कविताएं

1

प्‍यार आलोकित कर जाता है
सुबहों को
और शामों को
बनाता चला जाता है रहस्‍यमयी
प्‍यार
जैसे तारों से आती है टंकार…
और सारा दिन निस्‍तेज पड़े
चांद की रौशनी
वापस आने लगती है
प्‍यार
कि आत्‍मा अपने ही शरीर से बेरुख़ी करती
कहीं और जा समाने को मचलने लगती!
प्‍यार
और ख़ुशियों का ठाठें मारता पारावार चतुर्दिक
और आसमान डूबता चला जाता है समंदर में
उसके अनंत खारेपन को
अपनी नीली सुगंध से रचता…
रौशन करता
कि शब्‍दों की अनंत लड़ी
फूटने-फूटने को होती है जेहन से
और इस नाजुक लड़ी में कैद होता चला जाता है
कोई भी कठोरतम हृदय
प्‍यार
और अरुणाकाश में पसरने लगते हैं सप्‍तवर्णी रंग
पंछियों के परों को स्निग्‍ध और ऊर्जामयी करते हुए
प्‍यार
और पूरी रात नशे में फूटते हरसिंगारों को संभालती
थकने लगती है रात
और जा गिरती है सुबह की गोद में
सुगंध से पूरित!
प्‍यार
और दो नामालूम से जन
एक दूसरे को बनाना शुरू करते हैं विराट
तो फिर तमाम मिथकों और दंतकथाओं को
उनका पार पाना कठिन पड़ने लगता है
प्‍यार
एक धीमी-सी आकुल पुकार
जो बहुगुणित होती कँपाने लगती है
आकाशगंगाओं को
और तारों की छीजती बेचैन रौशनी
अनंत प्रकाश बिंदुओं में
तब्‍दील होती चली जाती है…

2

प्‍यार
जैसे एक हाहाकार
आकुल-व्‍याकुल जनों की नींद में जगता
दु:स्‍वप्‍नों की तरह
जनसमुद्र की अनंत पछाड
तोड़ती हाड तट का
प्‍यार
एक विनम्र इनकार
विश्‍वबाज़ार के सुनहले ऊँटों को
कि हम जो भी, जैसे भी है
स्‍वतंत्र और समृद्ध हैं
अपनी आत्‍मा के ताप के साथ
प्‍यार
कि हाँ तुम अब भी
ले सकते हो हमसे
अनंत उधार शब्‍दों का
और उसका मोल चुकाए बिना
उससे अपनी क़िस्‍मत
चमकाए फिर सकते हो
प्‍यार
पीड़ित जनों की आत्‍मा का
एकल और संयुक्‍त इश्‍तहार कि
हाँ, हम अकेले है
पीडि़त हैं, क्षुधित हैं
पर हम ही भर सकते हैं
विश्‍व का अक्षय अनंत अन्‍न,रत्‍नकोश
कि हमारी असमाप्‍त क्षुधा का
तुम नहीं कर सकते व्‍योपार…
प्‍यार प्‍यार प्‍यार
आदमी के अंतर और बाहर
दसों दिशाओ से आती है एक ही पुकार
प्‍यार प्‍यार प्‍यार

{अरूणा राय के लिए, एक सुबह जिनका चैट पर इंतज़ार करते यह कविता लिखी थी }
1

प्‍यार आलोकित कर जाता है
सुबहों को
और शामों को
बनाता चला जाता है रहस्‍यमयी
प्‍यार
जैसे तारों से आती है टंकार…
और सारा दिन निस्‍तेज पड़े
चांद की रौशनी
वापस आने लगती है
प्‍यार
कि आत्‍मा अपने ही शरीर से बेरुख़ी करती
कहीं और जा समाने को मचलने लगती!
प्‍यार
और ख़ुशियों का ठाठें मारता पारावार चतुर्दिक
और आसमान डूबता चला जाता है समंदर में
उसके अनंत खारेपन को
अपनी नीली सुगंध से रचता…
रौशन करता
कि शब्‍दों की अनंत लड़ी
फूटने-फूटने को होती है जेहन से
और इस नाजुक लड़ी में कैद होता चला जाता है
कोई भी कठोरतम हृदय
प्‍यार
और अरुणाकाश में पसरने लगते हैं सप्‍तवर्णी रंग
पंछियों के परों को स्निग्‍ध और ऊर्जामयी करते हुए
प्‍यार
और पूरी रात नशे में फूटते हरसिंगारों को संभालती
थकने लगती है रात
और जा गिरती है सुबह की गोद में
सुगंध से पूरित!
प्‍यार
और दो नामालूम से जन
एक दूसरे को बनाना शुरू करते हैं विराट
तो फिर तमाम मिथकों और दंतकथाओं को
उनका पार पाना कठिन पड़ने लगता है
प्‍यार
एक धीमी-सी आकुल पुकार
जो बहुगुणित होती कँपाने लगती है
आकाशगंगाओं को
और तारों की छीजती बेचैन रौशनी
अनंत प्रकाश बिंदुओं में
तब्‍दील होती चली जाती है…

2

प्‍यार
जैसे एक हाहाकार
आकुल-व्‍याकुल जनों की नींद में जगता
दु:स्‍वप्‍नों की तरह
जनसमुद्र की अनंत पछाड
तोड़ती हाड तट का
प्‍यार
एक विनम्र इनकार
विश्‍वबाज़ार के सुनहले ऊँटों को
कि हम जो भी, जैसे भी है
स्‍वतंत्र और समृद्ध हैं
अपनी आत्‍मा के ताप के साथ
प्‍यार
कि हाँ तुम अब भी
ले सकते हो हमसे
अनंत उधार शब्‍दों का
और उसका मोल चुकाए बिना
उससे अपनी क़िस्‍मत
चमकाए फिर सकते हो
प्‍यार
पीड़ित जनों की आत्‍मा का
एकल और संयुक्‍त इश्‍तहार कि
हाँ, हम अकेले है
पीडि़त हैं, क्षुधित हैं
पर हम ही भर सकते हैं
विश्‍व का अक्षय अनंत अन्‍न,रत्‍नकोश
कि हमारी असमाप्‍त क्षुधा का
तुम नहीं कर सकते व्‍योपार…
प्‍यार प्‍यार प्‍यार
आदमी के अंतर और बाहर
दसों दिशाओ से आती है एक ही पुकार
प्‍यार प्‍यार प्‍यार

{अरूणा राय के लिए, एक सुबह जिनका चैट पर इंतज़ार करते यह कविता लिखी थी }
1

प्‍यार आलोकित कर जाता है
सुबहों को
और शामों को
बनाता चला जाता है रहस्‍यमयी
प्‍यार
जैसे तारों से आती है टंकार…
और सारा दिन निस्‍तेज पड़े
चांद की रौशनी
वापस आने लगती है
प्‍यार
कि आत्‍मा अपने ही शरीर से बेरुख़ी करती
कहीं और जा समाने को मचलने लगती!
प्‍यार
और ख़ुशियों का ठाठें मारता पारावार चतुर्दिक
और आसमान डूबता चला जाता है समंदर में
उसके अनंत खारेपन को
अपनी नीली सुगंध से रचता…
रौशन करता
कि शब्‍दों की अनंत लड़ी
फूटने-फूटने को होती है जेहन से
और इस नाजुक लड़ी में कैद होता चला जाता है
कोई भी कठोरतम हृदय
प्‍यार
और अरुणाकाश में पसरने लगते हैं सप्‍तवर्णी रंग
पंछियों के परों को स्निग्‍ध और ऊर्जामयी करते हुए
प्‍यार
और पूरी रात नशे में फूटते हरसिंगारों को संभालती
थकने लगती है रात
और जा गिरती है सुबह की गोद में
सुगंध से पूरित!
प्‍यार
और दो नामालूम से जन
एक दूसरे को बनाना शुरू करते हैं विराट
तो फिर तमाम मिथकों और दंतकथाओं को
उनका पार पाना कठिन पड़ने लगता है
प्‍यार
एक धीमी-सी आकुल पुकार
जो बहुगुणित होती कँपाने लगती है
आकाशगंगाओं को
और तारों की छीजती बेचैन रौशनी
अनंत प्रकाश बिंदुओं में
तब्‍दील होती चली जाती है…

2

प्‍यार
जैसे एक हाहाकार
आकुल-व्‍याकुल जनों की नींद में जगता
दु:स्‍वप्‍नों की तरह
जनसमुद्र की अनंत पछाड
तोड़ती हाड तट का
प्‍यार
एक विनम्र इनकार
विश्‍वबाज़ार के सुनहले ऊँटों को
कि हम जो भी, जैसे भी है
स्‍वतंत्र और समृद्ध हैं
अपनी आत्‍मा के ताप के साथ
प्‍यार
कि हाँ तुम अब भी
ले सकते हो हमसे
अनंत उधार शब्‍दों का
और उसका मोल चुकाए बिना
उससे अपनी क़िस्‍मत
चमकाए फिर सकते हो
प्‍यार
पीड़ित जनों की आत्‍मा का
एकल और संयुक्‍त इश्‍तहार कि
हाँ, हम अकेले है
पीडि़त हैं, क्षुधित हैं
पर हम ही भर सकते हैं
विश्‍व का अक्षय अनंत अन्‍न,रत्‍नकोश
कि हमारी असमाप्‍त क्षुधा का
तुम नहीं कर सकते व्‍योपार…
प्‍यार प्‍यार प्‍यार
आदमी के अंतर और बाहर
दसों दिशाओ से आती है एक ही पुकार
प्‍यार प्‍यार प्‍यार

{अरूणा राय के लिए, एक सुबह जिनका चैट पर इंतज़ार करते यह कविता लिखी थी }


1

प्‍यार आलोकित कर जाता है
सुबहों को
और शामों को
बनाता चला जाता है रहस्‍यमयी
प्‍यार
जैसे तारों से आती है टंकार…
और सारा दिन निस्‍तेज पड़े
चांद की रौशनी
वापस आने लगती है
प्‍यार
कि आत्‍मा अपने ही शरीर से बेरुख़ी करती
कहीं और जा समाने को मचलने लगती!
प्‍यार
और ख़ुशियों का ठाठें मारता पारावार चतुर्दिक
और आसमान डूबता चला जाता है समंदर में
उसके अनंत खारेपन को
अपनी नीली सुगंध से रचता…
रौशन करता
कि शब्‍दों की अनंत लड़ी
फूटने-फूटने को होती है जेहन से
और इस नाजुक लड़ी में कैद होता चला जाता है
कोई भी कठोरतम हृदय
प्‍यार
और अरुणाकाश में पसरने लगते हैं सप्‍तवर्णी रंग
पंछियों के परों को स्निग्‍ध और ऊर्जामयी करते हुए
प्‍यार
और पूरी रात नशे में फूटते हरसिंगारों को संभालती
थकने लगती है रात
और जा गिरती है सुबह की गोद में
सुगंध से पूरित!
प्‍यार
और दो नामालूम से जन
एक दूसरे को बनाना शुरू करते हैं विराट
तो फिर तमाम मिथकों और दंतकथाओं को
उनका पार पाना कठिन पड़ने लगता है
प्‍यार
एक धीमी-सी आकुल पुकार
जो बहुगुणित होती कँपाने लगती है
आकाशगंगाओं को
और तारों की छीजती बेचैन रौशनी
अनंत प्रकाश बिंदुओं में
तब्‍दील होती चली जाती है…

2

प्‍यार
जैसे एक हाहाकार
आकुल-व्‍याकुल जनों की नींद में जगता
दु:स्‍वप्‍नों की तरह
जनसमुद्र की अनंत पछाड
तोड़ती हाड तट का
प्‍यार
एक विनम्र इनकार
विश्‍वबाज़ार के सुनहले ऊँटों को
कि हम जो भी, जैसे भी है
स्‍वतंत्र और समृद्ध हैं
अपनी आत्‍मा के ताप के साथ
प्‍यार
कि हाँ तुम अब भी
ले सकते हो हमसे
अनंत उधार शब्‍दों का
और उसका मोल चुकाए बिना
उससे अपनी क़िस्‍मत
चमकाए फिर सकते हो
प्‍यार
पीड़ित जनों की आत्‍मा का
एकल और संयुक्‍त इश्‍तहार कि
हाँ, हम अकेले है
पीडि़त हैं, क्षुधित हैं
पर हम ही भर सकते हैं
विश्‍व का अक्षय अनंत अन्‍न,रत्‍नकोश
कि हमारी असमाप्‍त क्षुधा का
तुम नहीं कर सकते व्‍योपार…
प्‍यार प्‍यार प्‍यार
आदमी के अंतर और बाहर
दसों दिशाओ से आती है एक ही पुकार
प्‍यार प्‍यार प्‍यार

{अरूणा राय के लिए, एक सुबह जिनका चैट पर इंतज़ार करते यह कविता लिखी थी }

गीत

जाने जीवन में क्यों हैं जंजाल इतने

दूर हो तुझ से बीतेंगे साल कितने

काम हैं जितने उतने इलजाम भी हैं

फूटती सुबहें हैं तो ढलती शाम भी है

भर छाती धँसकर जीता हूँ जीवन

कभी ये नियति देती उछाल भी हैं

जाने…

फैज इधर हैं उधर खय्याम भी हैं

लहरों पर पीठ टेके होता आराम भी है

खट-खट कर कैसे राह बनाता हूँ थोड़ी

जानता हूँ आगे बैठा भूचाल भी है

जाने…

मैं हिन्‍दू हूँ

मैं
हिन्‍दू हूँ
इसलिए
वे
मुसलमान और ईसाई हैं
जैसे
मैं चर्मकार हूँ
इसलिए वे
बिरहमन या दुसाध हैं

आज हमारा होना
देश-दिशा के अलगावों का सूचक नहीं
हम इतने एक से हैं
कि आपसी घृणा ही
हमारी पहचान बना पाती है
मोटा-मोटी हम
जनता या प्रजा हैं
हम
सिपाही पुजारी मौलवी ग्रंथी भंगी
चर्मकार कुम्‍हार ललबेगिया और बहुत कुछ हैं
क्‍योंकि हम
डॉक्‍टर इंजीनियर नेता वकील कलक्‍टर
ठेकेदार कमिश्‍नर कुछ भी नहीं हैं

उनके लिए क्‍लब हैं
पांच सितारा होटल हैं
एअर इंडिया की सेवाएं हैं

हमारे लिए
मंदिर – मस्जिद – गिरजा
पार्क और मैदान हैं
मार नेताओं के नाम पर
और उनमें ना अंट पाने के झगडे हैं

हम आरक्षित हैं
इसलिए हमें आरक्षण मिलता है
मंदिरों – मस्जिदों – नौकरियों में
जहां हम भक्ति और योग्‍यता के आधार पर नहीं
अक्षमताओं के आधार पर
प्रवेश पाते हैं
और
बादशाहों और गुलामों के
प्‍यादे बन जाते हैं।

मैं
हिन्‍दू हूँ
इसलिए
वे
मुसलमान और ईसाई हैं
जैसे
मैं चर्मकार हूँ
इसलिए वे
बिरहमन या दुसाध हैं

आज हमारा होना
देश-दिशा के अलगावों का सूचक नहीं
हम इतने एक से हैं
कि आपसी घृणा ही
हमारी पहचान बना पाती है
मोटा-मोटी हम
जनता या प्रजा हैं
हम
सिपाही पुजारी मौलवी ग्रंथी भंगी
चर्मकार कुम्‍हार ललबेगिया और बहुत कुछ हैं
क्‍योंकि हम
डॉक्‍टर इंजीनियर नेता वकील कलक्‍टर
ठेकेदार कमिश्‍नर कुछ भी नहीं हैं

उनके लिए क्‍लब हैं
पांच सितारा होटल हैं
एअर इंडिया की सेवाएं हैं

हमारे लिए
मंदिर – मस्जिद – गिरजा
पार्क और मैदान हैं
मार नेताओं के नाम पर
और उनमें ना अंट पाने के झगडे हैं

हम आरक्षित हैं
इसलिए हमें आरक्षण मिलता है
मंदिरों – मस्जिदों – नौकरियों में
जहां हम भक्ति और योग्‍यता के आधार पर नहीं
अक्षमताओं के आधार पर
प्रवेश पाते हैं
और
बादशाहों और गुलामों के
प्‍यादे बन जाते हैं।
मैं
हिन्‍दू हूँ
इसलिए
वे
मुसलमान और ईसाई हैं
जैसे
मैं चर्मकार हूँ
इसलिए वे
बिरहमन या दुसाध हैं

आज हमारा होना
देश-दिशा के अलगावों का सूचक नहीं
हम इतने एक से हैं
कि आपसी घृणा ही
हमारी पहचान बना पाती है
मोटा-मोटी हम
जनता या प्रजा हैं
हम
सिपाही पुजारी मौलवी ग्रंथी भंगी
चर्मकार कुम्‍हार ललबेगिया और बहुत कुछ हैं
क्‍योंकि हम
डॉक्‍टर इंजीनियर नेता वकील कलक्‍टर
ठेकेदार कमिश्‍नर कुछ भी नहीं हैं

उनके लिए क्‍लब हैं
पांच सितारा होटल हैं
एअर इंडिया की सेवाएं हैं

हमारे लिए
मंदिर – मस्जिद – गिरजा
पार्क और मैदान हैं
मार नेताओं के नाम पर
और उनमें ना अंट पाने के झगडे हैं

हम आरक्षित हैं
इसलिए हमें आरक्षण मिलता है
मंदिरों – मस्जिदों – नौकरियों में
जहां हम भक्ति और योग्‍यता के आधार पर नहीं
अक्षमताओं के आधार पर
प्रवेश पाते हैं
और
बादशाहों और गुलामों के
प्‍यादे बन जाते हैं।

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