Archive for the ‘जीवकांत’ Category

इजोरियामे नमरल आर्द्रांक मेघ

डाम्ह लताम-सन पीयर मेघ
इजोरियाक लेबर-रूम मे छटपटाइत अछि
झिसीआइत |
बाँसक झोंझ निराव
कौआक टेल्ह-गेल्ह सकदम्म |
प्रतीक्षा अछि
बहरायत मेघक पेटसँ
बहुत नाम आ बहुत चाकर
एक टा उज्जर झील
जाहिमे लतरत पुरैनिक पात —
बहुत रास !
जाहिमे नमरत सहस्त्रदल कमलक इजोत
बहुतरास  इजोत !
मुदा दर अछि—
झीलके कछेरमे सगबगायत —
लाल लाल आणखी बाला गोहि
सों-सों करत
आ……
नहि जानि……
क….क….रा…..???
उठा लऽ जायत   !

सीमा

थाकि गेल छियह,हे मित्र !
बहुत रास बाट टपलहुं, बहुत गिरीश्रिंगकें  नपलहुं |
बहुतो दूर आकाशमे बौअयलहुं
मुदा अपना सीमा मे एखनो, बद्ध,संकुचित छी |
एखनो वैह भूख, एखनो वैह पीड़ा ,
आकाशक बिस्तारमे बुझाइछ
निरर्थकता …..
एक टा ठेही |
थाकि गेल छियह,हे मित्र !
एखनो बडकी  टा आकाश
इशारा करैत अछि,
एखनो रहस्य बहुत रास मौन, बहुत रास प्रस्नचिंह|
मुदा हमर सीमा सभक ऊपर अछि
हमर क्षणिकता आ दौर्बल्य
हमरा एक टा परबा बना देने अछि
हमरा नहि होइछ—
एही शरीरें
हम सृष्टी कोनो  भागमें
तोड़ी सकब अपन संकुचन,सीमा,
अपदार्थत्व |
थाकि गेल छियह,हे मित्र !

१९ ६ ९ में श्री रामकृष्ण झा ‘किसुन’ द्वारा सम्पादित ‘मैथिलिक नव कविता” के किछ भाग

                                    परिचय
नाम -जीवकांत
जन्म तिथि – साओन शुक्ल  ७,१३४४ साल |
जन्म-स्थान -ग्राम -अभुआढ ,जिला सहरसा (मात्रिक)
स्थाई पता -ग्राम -ड्योढ़ ,पोस्ट -घोघरडीहा ,जिला -दरभंगा .
वृत्ति  -अध्यापन .
अभिरुचि -मूलतः कवि आ तत्पश्चात कथाकार .आलोचना आप्धर्मक रूप में .
प्रकाशित रचना -अनेक कविता , कथा ,निबंध ,भिन्न -भिन्न पत्र -पत्रिका सभमें प्रकाशित -प्रसारित | .
उपन्यास ‘पनिपत’  ‘अग्निवाण’  ‘मि.मिहिर’ में धारावाही प्रकाशित | उपन्यास ‘दू कुहेसक बाट’  पुस्तकाकार प्रकाशित  |
लेखानारम्भ – सन ५३ सँ हिंदी में | मैथिलि में ६४ सँ |
प्रथम मैथिलि प्रकाशित रचना ‘इजोरिया आ टिटही’ | 

                                       परिवार

रौदीक देबाल

दाहीक छाडनि

घरक ओगरबाही करैछ एक टा कालसल गाछ —

लूपक छिट्टा तर झाँपल |

दूर-

एक टा पौध यंत्रक पुजिंस अबेछ

अंतर्देशीय पत्र +मनिआडर

 

सौन्दर्य-बोध
गाड़ीक खिड़कीसँ
आकाशक एक कतार देखाइत अछि
ताहि में चाँद उगि रहल अछि
सूर्यक रक्तवर्ण किरिन ओंघड़ाइत पड़ाइत अबैत अछि
फेर रंग बदलैछ
पहिने  संतोला,तखन,सोनाक वर्ण
जेना आकाशक भट्टीमें कालदेवता क्षणक भाथीसँ
लोह धिपबैत हो |
चानक रंग बदलैछ
प्रतिक्षण नबका चान
हम रोकि नहि सकैत छी विकासकें
आ,रोकब होयत एक टा कुरूप अभिलाष
अगिला क्षणक सौंदर्यसँ वंचिते ने  रहि जायब ?
चान कखनो मलमली कुहेसमे रहैछ
कखनो मेघक क्वार्टरमें संहिया जाइछ
कखनो आकाशक पलङपर
नाङट वेश्या-सन पडल रहैछ
मोहक आ अश्लील |
तैयो हमरा चान बासि फूल बुझाइत अछि
काल्ही फेर उगत ई चान —
एहिना! पडिबाकें जनमत पूर्णिमाकें बहसत
आ अमाक  छौरझप्पीमे दबा जायत  |
बेस |
चान तखन नीक अछि नीके रहैत
मुदा,प्रतिमास,प्रतिवर्ष आ प्रतिदिन
वैह आवृति,आ वैह चान!
आवृतिदास चान |
आवृति थिक वेश्याक दैनिक सोहागाक सेज !
गोली मार चानकें
बासी फूलक ढेरीकें
आ हम गाड़ी में
खीरकीक पल्ला खसा दैत छी   

 

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