Archive for the ‘तारानंद वियोगी’ Category

यात्रीजी की वैचारिकता

हाल में प्रकाशित अपने एक लेख में मोहन भारद्वाज ने यात्रीजी के लेखन पर अपनी निष्पत्ति स्पष्ट करते हुए कहा है — ”यात्री जी अपनी वैचारिकता तथा मान्यता के लिए प्रसिद्ध हैं। उनकी वैचारिकता तथा मान्यता को मार्क्सवाद की पुस्तकें पढकर अथवा वामपंथी राजनीतिक दलों की गतिविधियां देखकर समझना संभव नहीं है। इसके लिए उनकी रचनाओं मे पैठना जरूरी है।’

श्री भारद्वाज स्वयं एक मार्क्सवादी समीक्षक हैं। मैथिली में मार्क्सवादी ढंग की व्यावहारिक समीक्षा पर काम करने वाले दो आलोचकों– कुलानन्द मिश्र एवं मोहन भारद्वाज — में वह एक हैं। और, वह व्यक्ति कहते हैं कि मार्क्सवाद की पुस्तकें पढकर जानना संभव नहीं है, तो जरूर यह एक विचारणीय बात बन जाती है।

हिन्दी में यात्रीजी के लिए जो विशेषण सर्वाधिक प्रसिद्ध हुआ वह है- ‘जनकवि’। इस शब्द का परम्परा-प्रसूत अर्थ है-जनता का कवि। यात्रीजी स्वयं को इसी अर्थ मे सब दिन जनकवि समझते रहे। लेकिन इसका दूसरा अर्थ है–जनवादी कवि। वामपंथी विचारधारा के लिए लोकप्रसिद्ध शब्द है-जनवाद। इसे जिसने बखूबी अपनी रचनाओं में उतारा– ‘बखूबी’ इस अर्थ मे कि आमजन तक पहुंचने की संप्रेषणीयता उसकी रचनाओं में भरी-पूरी हो, वह हुआ- जनवादी कवि।

यह एक दिलचस्प स्थिति है कि मार्क्सवादियों ने तो उन्हें ‘जनवादी कवि’ के अर्थ में ‘जनकवि’ कहा लेकिन यात्री जी ने ‘जनता के कवि’ के अर्थ में इसे ग्रहण किया। थोपने-जैसा दबाव यदि कभी आया भी तो उन्होंने साफ-साफ कहा कि ‘मैं जनकवि हूं तो अपनी जनता का कवि हूं।’

मगर, मोहन भारद्वाज कहते हैं कि उनकी वैचारिकता को पुस्तक से जानना असंभव है, तो इसका क्या अर्थ हे्? अगर किसी की मान्यता मार्क्सवादी होगी तो मार्क्सवाद की पुस्तकों से क्या उसका इतना विरोध हो सकता है कि उसका जानना ही असंभव हो। यह तो हो सकता है कि पूरापूरी जानना संभव न हो, पर अपर्याप्तता और असंभवता,  दोनों एक ही चीजें तो नहीं हैं। क्या मार्क्सवाद एक ऐसा शैतान बालक है,जिससे यात्रीजी के घर का पता पूछो तो वह हमें गलत रास्ता बतला देगा?  या फिर, वह एक ऐसा परदेसी व्यक्ति है जिसे खुद ही उनके गांव का पता नहीं मालूम, तो वह हमें क्या बताएगा?  लेकिन हम देखते हैं कि यात्रीजी के जीते-जी उनका जिन्दाबाद भी खूब हुआ और मुर्दाबाद भी। मुद्दा हमेशा मार्क्सवाद रहा। विरोधियों ने मार्क्सवादी होने के लिए उनका मुर्दाबाद किया और मार्क्सवादियों ने मार्क्सवाद से उनके विचलन के लिए। और, मुद्दे का यह केन्द्र-विन्दु क्या इस लायक भी नहीं कि उसकी सहायता लेकर उन्हें जाना जा सके। प्रश्न तो यह वाकई महाभीषण है।

इस स्थिति में जब हम मोहन भारद्वाज की इस पंक्ति को पढते हैं कि ‘यात्रीजी अपनी वैचारिकता तथा मान्यता के लिए प्रसिद्ध हैं’–तो यह जानने की आतुरता होती है कि जिसके लिए वह प्रसिद्ध थे वह वैचारिकता तथा मान्यता कौन-सी थी। उसके क्या गुणधर्म हैं? और नाम-गोत्र?  और, शास्त्र? इन प्रश्नों का कोई उत्तर भारद्वाज नहीं देते और ‘नेति-नेति’ वाली शैली में बस इतना ही कहते हैं कि जानने के लिए उनकी रचनाओं में डुबकी लगाना जरूरी है। उन्होंने ‘समझदार को इशारा काफी’ वाली शैली में बात कही है, लेकिन कहना चाहिए कि एक सही बात कही है।

हम सभी जानते हैं कि यात्रीजी अपनी वैचारिकता के लिए प्रसिद्ध हैं। मैथिली लेखकों के लिए कलम-कागज-दावात के साथ-साथ वैचारिकता के होने का भी, एक जरूरी चीज में शुमार यात्रीजी के जमाने में ही हुआ। सभी जानते हैं कि पुरातनवादी स्कूल को उनकी यह वैचारिकता सख्त नापसंद थी। इसकी वजह से उनकी जितनी निन्दा हो सकती थी, हुई। उनके रास्ते कठिन किए गए। उसपर जगह-जगह कांटे रोपे गए। मैथिली को छोडकर वह भाग जाएं, ऐसी परिस्थिति बनाई गई। जो लोग कहते हैं कि आर्थिक कारणों से ही उन्हें मैथिली छोडनी पडी,वे यथार्थ को सरलीकृत करते हैं।

यात्रीजी ने स्वयं मैथिली छोडी हो या मठाधीशों ने छुडवा दिया हो, यह पक्का है कि उसकी वजह यह वैचारिकता ही थी। हिन्दी मे प्रसिद्धि और प्रतिष्ठा पा लेने के बाद जब वह एक बार फिर से मैथिली मे सक्रिय हुए, तो हम पाते हैं कि उस वक्त तक पुरातन-स्कूल की आभा थोडी मद्धिम पडने लगी थी। आधुनिकता और विज्ञान-बुद्धि के हक में, मैथिली के बींसवीं सदी के इतिहास की यह एक महत्त्वपूर्ण घटना थी। इसे लोग ‘चित्रा’  के प्रकाशन (१९४९) के रूप में भी याद करते हैं।

जब यह कहा जाता है कि यात्रीजी अपनी वैचारिकता और मान्यता के लिए प्रसिद्ध हैं, पर उनकी वैचारिकता के बारे में अलग से कुछ भी नहीं बताया जाता है.  तब भी इतना स्पष्ट हो ही जाता है कि उनकी वैचारिकता वामपंथ है। ऐसा स्पष्ट होने के पीछे उनका प्रभामंडल है, उनकी स्थापित छवि है। जीवन-जगत को देखने का उनका दृष्टिकोण, व्यवस्था के प्रति उनका रुख, उनकी प्राथमिकताएं, प्राथमिकता-निर्धारण के उनके सूत्र और संघर्ष के प्रति उनका रुझान–ये सब चीजें हैं, जो मार्क्सवादी मतों से मेल खाते हैं। केवल मेल खाने की बात नहीं, यह सब इतना जगजाहिर है कि अलग से उनकी वैचारिकता के बारे में सोचे जाने की जरूरत भी दिखाई नहीं पडती। यह हुआ है।

प्रश्न है कि उनकी वैचारिकता को मार्क्सवाद की पुस्तक पढकर क्यो नहीं समझा जा सकता?  इसका कोई उत्तर हमें मोहान भारद्वाज के लेख में तो नहीं ही मिलता है, यात्री जी के निधन के बाद जो अनेकानेक पत्रिकाओं के विशेषांक निकले उनमें छपे लेखों से भी नहीं होता। जिन लोगों ने भी उन्हें नजदीक से देखा है,उन्हें पता है कि यात्रीजी हद दरजे के प्रगतिशील थे। कोई व्यक्ति अपनी चेतना के आखिरी छोड पर जाकर जितना प्रगतिशील हो सकता है, उतना। किसी राजनीतिक दल से हम इस स्तर की प्रगतिशीलता की उम्मीद नहीं कर सकते, और न यह कि वे इस दरजे के व्यक्तियों को हजम कर पाएं। पुस्तकें तो यूं भी जड होती हैं जबकि जीवन चेतन और स्पन्दनशील। शास्त्र को देखकर जीवन का आकलन करना एक खतरनाक धंधा हो सकता है जो, हम देखते हैं कि मार्क्सवादियों ने खूब किया है।

दरअसल मार्क्सवाद जीवन और जगत को व्याख्यायित करने एक सटीक दृष्टिकोण है। एक दृष्टिकोण का होना ही इसकी अधिकतम संभाव्यता है। और, साहित्य, यदि वह मौलिक रूप से साहित्य के गुण-धर्मों से पुष्ट है, तो वह किसी दृष्टिकोण की व्याख्या-मात्र नहीं हो सकता। शास्त्रों का जड होना ही उसकी सीमा है। कि वह चेतन जीवन को जानने का उत्तेजन तो जरूर हो सकता है पर स्वयं जीवन या उसका दर्पण नहीं बन सकता। साहित्य का लेखन हृदय से हृदय तक पहुचने की प्रक्रिया है, जिसमें खुद ही परिवर्तन के त्तत्व समाए हुए हैं।

१९७५ में छपी उनकी एक प्रसिद्ध कविता है–‘प्रतिबद्ध हूं’ । इस कविता का शीर्षक तो जरूर है–‘प्रतिबद्ध हूं’  लेकिन कविता के आरंभ में ही उन्होंने साफ कर दिया है कि वह केवल प्रतिबद्ध ही नहीं हैं,सम्बद्ध और आबद्ध भी हैं। यह कविता उनकी प्रतिबद्धता, सम्बद्धता और आबद्धता की विस्तृत सूची प्रस्तुत करती है। एक जगह वह कहते हैं कि बहुजन-समाज की अनुपल प्रगति के लिए वह प्रतिबद्ध हैं, तो फिर वहीं यह भी कह जाते हैं कि अविवेकी भीड के भेडियाधसान के प्रति भी वह प्रतिबद्ध हें और स्वयं को अपने व्यामोह से बारंबार उबारने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। वामपंथी राजनीति में इस प्रकार की प्रतिबद्धता बडी उकडू ढंग की चीज मानी जाएगी। और जब अपनी सम्बद्धता और आबद्धता की सूची वह पेश करते हैं तब तो पुस्तकों से और भी दूर चले जाते हैं। ऐसे में, और कोई रास्ता जब बचा नहीं दीखता तो डा० नामवर सिंह को इस कविता पर अन्ततः यह कहना पडता है कि ‘नागार्जुन के ये विचार आचार से पुष्ट हैं, इसीलिए इनमें सच्चाई की ताकत है।’

और, क्योंकि यात्रीजी की वैचारिकता प्रतिबद्धता, सम्बद्धता और आबद्धता– इन तीनों की ही समाहारी वैचारिकता है, इसलिए भी शास्त्रीय पद्धति-मात्र से उन्हें जानना संभव नहीं है।

फिर, यह बात भी है कि भीषण रूप से प्रतिभाशाली होना जिसे कहा जाता है, वैसे प्रतिभाशाली यात्रीजी थे। उनकी नवनवोन्मेषशालिनी बुद्धि कदम-कदम पर अपनी स्फूर्ति दिखा सकती थी। दूसरी बात यह थी कि वह अपने गांव-घर, लोक-वेद, देस-कोस से बडी ही गहराई से जुडे हुए थे। उनकी यह संलग्नता इतनी गहरी थी कि सात-तह नींद में भी वह इससे अलग नहीं हो सकते थे। और, संलिप्तता इतनी विचित्र कि दूसरी किसी भी चीज को इसके लिए त्याग सकते थे। यही वह जगह थी जहां वह शास्त्र को भी ठेंगा दिखा सकते थे, पार्टी को भी।

मैं जैसा समझता हूं, प्रगतिशीलता का सहज गुण-धर्म है–सतत जागरूकता। जागरूक हुए बगैर शायद प्रगतिशील नहीं बने रहा जा सकता। और, जहां सतत जागरूकता रहेगी, वहां सतत परिवर्तनशीलता का गुण भी जरूर पाया जाएगा। हम बचपन से ही सुनते आए कि परिवर्तन ही प्रकृति का प्रधान नियम है। मार्क्सवाद जिस प्रधान वस्तु की कामना करता है, उसका नाम भी परिवर्तन ही है। परिवर्तन तो एक सहज ब्रह्माण्डीय घटना है, जिसे हर हाल में घटित होना है, चाहे हम उसकी कामना करें चाहे न करें। हां, श्रेयस्कर कामना हर कोई करना चाहता है, उस नाते ठीक। लेकिन हमें अचरज भी कम नहीं होता जब हरसू परिवर्तन के पैरोकार वामपंथियों को भी हम यात्री जी के परिवर्तन-धर्म पर सीदित होते देखते हैं। हर युग में शायद यही होता आया है। जो जीवन के पक्ष में खडा होता है और जीवन के लिए शास्त्र से विद्रोह करता है, शास्त्र उसके साथ यही करता है। ऐसे मौकों पर ब्राह्मणवादी कर्मकाण्ड जिस तरह प्रतिक्रियायित होता है, मार्क्सवादी कर्मकाण्ड भी शायद उससे अलग होता नहीं दीखता।

जीवन के आखिरी दिनों में यात्रीजी ने एक पत्रकार से कहा था– ‘हम गांव जाएंगे तो बूढे लोग अब भी बुलाएंगे—‘अरे ठक्कन ! नागार्जुन कहने से वे नहीं चीन्हेंगे।’  –आप क्या इसे मामूली बात समझते हैं?  जीवन और जीवन्तता के कितना करीब था वह आदमी,  देखिए–अपनी परिचिति तक के आत्मतोष में।

प्रगतिशील थे यात्रीजी, वह भी हद दरजे के। मगर, इसके अतिरिक्त वह और भी बहुत कुछ थे। इनमें से कुछ चीजें मार्क्सवादियों को सूट करती थीं। मगर, कुछ ऐसी चीजें भी थीं जो उन्हें सूट नहीं करतीं थीं। इसके लिए वे उन्हें ‘हूट’ करते थे।यह सूटिंग और यह हूटिंग, उनके मनोरंजन के साधन थे। इसपर वह हंसा करते। बहुतों ने उन्हें हंसते देखा होगा। मैंने भी देखा है।

इसलिए मोहन भारद्वाज की यह बात मुझे ठीक लगती है कि मार्क्सवाद की पुस्तकें पढकर और वामपंथी राजनीति की गतिविधियां देखकर यात्रीजी को नहीं समझा जा सकता। फिर भी, अगर समझने की जिद करें तो निष्कर्ष गलत आएंगे। मगर उन्हें समझने की जरूरत है भी किसको?  यदि कोई संकल्पित हो कि हर हाल में उसे यात्रीजी को जानना ही जानना है, तभी तो यह बात लागू होती है। वरना, ब्रह्माण्ड में ऐसी कौन-सी चीज है जिसे मार्क्सवाद के नजरिये से समझा नहीं जा सकता। यात्रीजी तो महज एक मामूली चीज हैं। लेकिन तब जो निष्कर्ष आएंगे, वे उन्हें अतिभावुक, खब्ती, नौटकिया, ढुलमुल,सिद्धान्तहीन, समझौतावादी आदि-आदि मानने को बाध्य करेंगे। (ये विशेषतावाची शब्द मेरे नहीं, मार्क्सवादियों के हैं, जो उन्हें समय-समय पर बख्शे गए हैं।) महान आलोचकों की बात तो छोडें, विश्वविद्यालय से पी-एच०डी० करनेवाला ‘युवक विद्वान’ भी जब मार्क्सवाद के नजरिये से उन्हें देखता है, तो उसके निष्कर्ष कुछ इस तरह होते हैं–‘नागार्जुन को जनकवि मानने में एतराज तो नहीं है, किन्तु एक शंका बार-बार मन में खटकती है। कवि भावुकता के वशीभूत जनता के साथ कहीं-कहीं भटक जाता है। इस प्रकार उसके जनवाद पर प्रश्नचिन्ह लग जाता है। जनता के साथ उसका मोह कभी-कभी इतना गहरा हो जाता है कि उसकी सामाजिक एवं राजनीतिक चेतना पर भी पुनर्विचार करना पडता है।’ (‘नागार्जुन की काव्ययात्रा’ में डा० रतन) पुनर्विचार की मांग से ज्यादा किसी के खिलाफ और आप क्या मांग कर सकते हैं? मुझे तो लगता है कि पहली बार जिसने उन्हें जनकवि कहा होगा, उस मार्क्सवादी की समूची जिन्दगी पछतावे में कटी होगी।

यह बात जरूर है कि हममें से अनेक उदार लोगों ने उनके लिए जगह बनाने की मंशा से उन्हें ‘किसानी चेतना के कवि’ और ‘राष्ट्रवादी मार्क्सवाद के उद्गाता’ आदि विशेषणों से विभूषित किया। लेकिन ये निष्पत्तियां भी अन्ततः पद्धतिहीन निष्पत्तियां थीं। इनके निषेध के लिए शास्त्र के पास हजार तर्क थे। यह तो मानो उद्दाम जीवन्त प्रगतिशीलता और जनपक्षधरता को शास्त्र के कठघरे में खडे कर न्याय देने की कोशिश थी, जैसे कोई सुबह की पहली किरण को बक्से में बन्द कर संसदभवन ले जाए–माननीयों के अवलोकनार्थ।

यात्रीजी की ओर से देखा जाए तो यह साफ-साफ दीखता है कि वह सदा-सर्वदा शोषित-दलित-पीडितों के पक्ष में खडे रहे। हमेशा। जब वह विद्यार्थी थे, तब भी। संन्यासी हुए, तब भी। मार्क्सवादी हुए तब भी और उधर से हटे, तब भी। मृत्युशय्या पर थे तब भी उनका पक्ष नहीं बदला था।

जो भी कोई जहां भी कहीं शोषित-पीडित था, वह उसके साथ रहे और जो शोषक थे उनके खिलाफ रहे। वह केवल कांग्रेस और ब्राह्मणवाद के ही खिलाफ नहीं हुए, जरूरत पडी तो आधुनिकता और मार्क्सवाद के भी खिलाफ खडे हुए। सम्प्रदाय के दीपक तले तो अंधेरा जरूर ही पाया जाता है, भले अन्यान्य दीयों के तले रहे या न रहे। मार्क्सवादी होकर भी कोई मार्क्सवादी को ही गद्दार कहे, उन दिनों यह समझ में आनेवाली बात नहीं थी। लेकिन यह तो उन लोगों की समस्या थी, वे उसे सुलझाते। यात्रीजी को तो अपना पक्ष स्पष्ट दीख रहा था–‘जो नहीं हो सके पूर्णकाम; मैं करता हूं उनको प्रणाम।’

कभी-कभी तो मुझे लगता है कि जो गहरी चेतना उनके भीतर थी, वह मात्र ‘कवि’ होने से साधित न हो सकती थी। कहा तो जाता है-‘जहां न जाय रवि वहां जाय कवि’, लेकिन इस दरजे की गहरी संलग्नता के लिए सिर्फ कवि होना पर्याप्त नहीं हो सकता।  मेरा खयाल है कि इतनी गहरी संलग्नता, वह भी इतनी निरन्तरता और एकसूत्रता के साथ, कवि होने भर से शायद साधित नहीं हो सकती। इसके लिए स्वयं भोक्ता होना, दलित-पीडित होना जरूरी है। जिन्होंने यात्रीजी की आरंभिक संघर्षयात्रा देखी है या उनसे सुनी है या जो थोडा-बहुत इस बारे में उन्होंने लिखा है, उसे पढा है, वे जानते हैं कि जिस जगह से वह चले और जिन रास्तों से बढे— जिस तरह से और जिन संघर्षों का सामना करते हुए—  उनका स्वयं का मानस भी एक दलित-पीडित की मनोरचना से सृजित हुआ था। यह पीडा उनकी स्वयं की पीडा थी। वह उसमें शामिल थे। दलित-पीडितों के प्रति उनकी पक्षधरता अचूक थी क्योंकि उनके साथ वह स्वयं को शामिल पाते थे। इसी का विस्तार हमें उनके ‘आमजन’ की समझ में दीखता है।

मैं सोच रहा था कि भारतीय साहित्य मैं इन दिनों दलित साहित्य की बडी चर्चा सुनी जाती है। मैथिली में भी हम इसकी धमक सुन ही रहे हैं। जाति से जो दलित हैं, वे तो बडी ही सुविधापूर्वक अपना दलितत्व प्रमाणित कर सकते हैं। लेकिन यह सोच भी कम प्रामाणिक नहीं कि दलितत्व एक मनोनिर्माण है। आपका दलित-मनोनिर्माण कितना सघन हुआ है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि आप कितने जटिल कर्मकाण्डी और जात्याभिमानी समाज में पले-बढे हैं। मिथिला तो एक बेजोड जनपद है, जहां यह भी चलन रहा है कि ब्राह्मणों का छुआ पानी भी दूसरा ब्राह्मण नहीं पीता। जातीय कोटिक्रम इतने जटिल हैं कि एक ब्राह्मण दूसरे को अछूत समझे, इसके लिए हजार तर्क हैं। और, कर्मकाण्डीय जटिलता इतनी जाहिल कि महाराष्ट्र में जो भोग डोम और मेहतरों ने भोगा, मिथिला में वह भोग भोगने को तेली-धानुक-कोइरी आदि मध्यवर्ती जातियां बाध्य होती रहीं। इस बात के विस्तार में जाने की बहुत जरूरत मैं नहीं समझता कि मैथिली साहित्य का बहुलांश, यात्रीजी के बाद भी और उनके बावजूद भी, दुनिया-जहान को देखने की ब्राह्मण-दृष्टि की उपज है। यूं दीखती तो करुणा भी है, दया-ममता भी, मगर कुल मिलाकर वह भी दीन-दलित को देखनेवाले दयालु ब्राह्मण का नजरिया है। मैथिली साहित्य में निरूपित संस्कृति यहां की शास्त्रीय संस्कृति है। समुचित मनोनिर्माण के अभाव में लोक-संस्कृति का पुनर्लेखन भी किस तरह प्रदूषित हो जाता है, इसका दृष्टान्त हमें मणिपद्म के काम में दिखाई पडता है। दरअसल बहुत थोडे-से लोग हुए, जिनमें दलित-दृष्टि है और उसके साथ समुचित मनोनिर्माण की ऊष्मा भी है।

यह चीज हमलोगों ने यात्रीजी में देखी कि ब्राह्मण-दृष्टि के समानान्तर एक दूसरी दृष्टि भी हो सकती है, और, वह है– दलित-दृष्टि। इसकी जड अवश्य ही मिथिला की किसानी चेतना में है, पर स्वानुभूति के ताप से यह उनके भीतर सिद्ध हुआ है। इसकी तर्कसंगति अचूक है, और इसने उनकी आस्था पाई है, इसे उनकी मेधा की आधारशिला प्राप्त है। यही वह चीज है, जिसकी वजह से परंपरागत वैचारिकताओं के साथ उनका टकराव होता रहा है। यह इस तरह उनमें व्याप्त है मानो स्वयं में एक परिपूर्ण वैचारिकता हो। यहां हम , उदाहरण-प्रत्युदाहरण के व्यामोह से मुक्त रहते हुए इस चीज के गुण-धर्मों का एक मोटा आकलन कर सकते हैं—

( १ ) दलित-दृष्टि की यह सामान्य मांग होती है कि सम्पूर्ण मानवीय गरिमा के साथ दलित (तसल्ली के लिए इसके साथ ‘शोषित’ और ‘पीडित’ शब्द भी जोड ले सकते हैं) समुदाय को साहित्य में उठाया जाए। ‘मानवीय गरिमा’ बहुत ही महत्त्वपूर्ण संदर्भ है। यह मौजूद रहे तभी किन्हीं दूसरी बातों पर बात हो सकती है। पर, मैथिली में स्थिति है कि लोग सर्वनामों और संबोधनों तक के चयन में गरिमा का खयाल नहीं रख पाते, और तो बात ही छोडें। ‘मानवीय गरिमा’ जब कहा जाता है तो मैं पाता हूं कि इसका निर्वाह भी द्विस्तरीय है। एक तो दलितों के स्तर पर, कि वे जब पात्र बनकर आते हैं तो ‘पांगे’ हुए शीशम की तरह न आएं। शीशम की जब सारी टहनियां काट दी जाती हैं तो कैसा दीखता है?  लेकिन काटनेवालों का तर्क होता है कि शीशम इससे मुटाएगा। यही तर्क ब्राह्मणवाद का भी है कि दलित इससे कायदे में रहेंगे।

मानवीय गरिमा के निर्वाह का दूसरा स्तर कवि से संबंधित है। वह यूं कि पूरी आस्था के साथ वह इसकी कोशिश करे कि उसकी दृष्टि में ब्राह्मण-दृष्ट्यादि विजातीय दृष्टियों का मिश्रण न होने पाए। उसकी, यानी कि अपने पात्र की गरिमा बचाते हुए ही वह अपनी गरिमा भी बचा पाएगा। यात्रीजी के लेखन को देखें तो यह चीज हमें भरपूर दिखाई देती है। दोनों स्तरों के निर्वाह में तो वह बेजोड हैं।

( २ ) दलित-लेखन के रूप में जो साहित्य आज हमारे सामने आ रहा है, उसे अक्सर हम अव्याप्ति का शिकार पाते हैं। ब्राह्मण लोग दलितों पर अत्याचार करते हैं,दलित-जीवन का यह मात्र एक पहलू है। दलित का जीवन सिर्फ इसके लिए नहीं होता कि ब्राह्मणों के द्वारा उनपर अत्याचार किए जाएं और लेखक करुणा या आक्रोश से ओतप्रोत होकर इसका वर्णन करता रहे। उनकी एक उर्वर जीवनशैली भी होती है,सम्पन्न संस्कृति भी होती है,उसके भी हास-परिहास होते हैं,उसके भी रोजी-रोजगार की अपनी बारीकियां होतीं हैं। फिर उसके राग-विराग हैं, उसकी सौन्दर्यदृष्टि है। क्या नहीं है उसके पास, जो ब्राह्मणों के पास है?  पता नहीं क्यों हमारे दलित लेखक इन चीजों के विन्यास में रुचि लेते नहीं दीखते, जबकि साहित्य के दूरगामी उद्देश्य के हिसाब से देखें तो यही विन्यास सबसे जरूरी है।

हम देख सकते हैं कि यात्रीजी बहुत सहजता के साथ यह कर सके। उनका ‘दलित’ यानी कि शोषित-पीडित, जाति की घेराबंदी में बंधा हुआ समुदाय नहीं है। वह एक समूह है जो शूद्र, स्त्री और बच्चे– इन तीनों से मिलकर बना है। मनोरचना की भूमिका चूंकि इसमें सबसे प्रधान है, बहुत आसानी से उनकी निष्पत्तियां अन्य समुदाय को भी अपने टारगेट के भीतर ले आती है। ‘ताडक गाछ’ कविता में जब वह कहते हैं–‘लगाबथु ग’ केओ कतेको जोर बाप-पित्ती कें करथु ग’ सोर मुदा रोइयां एकोटा ओकर उपाडल नहि हेतन्हि ककरो बुतें’ ( कोई कितना भी जोर आजमाइश कर ले, और इसमें चाहे अपने बाप-चाचों की भी मदद ले ले, पर इसका एक बाल तक वे उखाड नहीं पाएंगे। ) तो वह दरअसल विधाता के विधान को चुनौती देनेवाले दलितों की बात करते हैं। उनके दलित ऐसे हैं। इस कविता की व्याप्ति बडी है। अविवेकी समाज का मारा हुआ, झिंझोडा हुआ जो भी कोई कहीं होगा, इस कविता से वह समर्थन पा सकता है।

( ३ )यात्रीजी देख पाते हैं कि इन बंचितों को प्रताडित करनेवाली चीज केवल परम्परा ही नहीं है, वह आधुनिकता भी है। परम्परा, यानी कि धर्म, जाति, समाज, नैतिकता, आदि। और, आधुनिकता, यानी कि लोकतंत्र, फासिज्म, मार्क्सवाद, बाजार आदि।  जब वह कहते हैं–‘फटै छी कुसियारक पोर जकां चैतक पछबा मे ठोर जकां’ (जिस तरह ईख का पोर फटता है, वैसे फट रही हूं; जिस तरह चैत की पछुआ हवा में होंठ फटते हैं, उस तरह फट रही हूं। ) तो हम परम्परा की प्रताडना का दृश्य देखते हैं, और जब कहते हैं–‘प्रभु पटेल छथि सर्वशक्ति-सम्पन्न कनबथि तैयो चीनिक लेल हकन्न’ (माननीय मंत्री पटेल सर्वशक्ति-सम्पन्न हैं मगर तब भी चीनी के लिए रुला रहे हैं ) तो सत्ता की जटिलताएं प्रताडक की भूमिका में नजर आती है।

लेकिन, याद रखना चाहिए कि दलित-बंचित भी अगर ये हैं, तो यात्रीजी के हैं। सूचीभेद्य अन्धकार में भी इन्हें रोशनी का कोई-न-कोई कतरा दीख ही जाता है। किसी के मुंह में बोल न होना, जीने का अधिकार भी न होने का परिचायक नहीं हो सकता। उद्दाम जिजीविषा है उसके पास और यात्रीजी उसके साथ खडे मिलते हैं। अपनी कविता ‘चें चें चें चें’ में वह यह बताते हुए कि ‘नहि छैक परबाहि एकरा सबहि कें नव घर उठल कि पुरान घर खसल’ ( इन्हें कोई परवाह नहीं है कि किसी का नया घर उठा या पुराना घर गिरा’ ), बडे आराम से वह यह निष्पत्ति दे जाते हैं–‘प्रशासकीय विधि-निषेधक बन्धन मानत की कउखन चिडै-चुनमुन’ ( जो चिडियों का-सा जीवन जीनेवाले लोग हैं, वे भला प्रशासकीय विधि-निषेध का बन्धन कब स्वीकार करेंगे? )

सुदूर अतीत से लेकर सद्यः वर्तमान तक जो लोग हाशिये पर ठगे-से खडे रहे हैं और अपने वजूद तक के लिए व्यंग्य सहने की दारुण पीडा से गुजर रहे हैं, यात्रीजी  बडे ही आस्था के साथ जाकर उसके समर्थन में खडे होते हैं। याद कीजिए तरौनी ग्रामवासी सरजुग राउत को, जिनपर उन्होंने ‘जोडा मन्दिर’ कविता लिखी है। अपने माता-पिता की स्मृति में सरजुग ने जोडा मन्दिर बनवाया है। यह चीज सामाजिक चलन में नहीं है। तो, स्वाभाविक ही है कि ‘बाभन-गांव में राड पजियार’ वाली नैतिकता के वशीभूत बाबू-भैया लोग सरजुग की हंसी उडाते हैं। और देखें कि इस प्रकरण में यात्रीजी सरजुग को क्या हितोपदेश देते हैं। कहते हैं–‘धुः मरदे, इहो केओ बाजय बूझल नहि छह तोरा? तरउनी गामक बाबू-भइया लोकनि हंसी उडबै छथि हमरो।” ( अरे छोडो भी जवान, यह भी कोई बतानेवाली बात हुई?  तुम्हें मालूम नहीं कि तरौनी गांव के बाबू-भैया लोग मेरी भी हंसी उडाते हैं। )

प्रसंगवश, यहां प्रयुक्त शब्द ‘हमरो’ (मेरी भी) पर जरा गौर करें। कहने का क्या मतलब है उनका कि हंसी उडाते हैं मेरी भी? क्या वह स्वीकार कर रहे हैं कि वह भी बाबू-भैया समुदाय के ही एक व्यक्ति हैं?  या फिर किसी दूसरे कारण, जैसे संन्यासी या वामपंथी होने की वजह से उनकी हंसी उडती है। अन्ततः क्या वह भी बाबू-भैया ठहरे?  नहीं। हैं तो वह समवर्गी सरजुग के ही, इसमें उन्हें कोई सन्देह नहीं है। पर, सन्देह है सरजुग को। तभी तो उसने अपनी बात बताने के पहले यात्रीजी की ‘नजर की थाह’ ली थी और तब ‘कनफुसकी आवाज’ में अपनी शिकायत बताई थी। याद कीजिए कि बाबू-भैया के गांव में शूद्रों के शिकायत करने का यही लहजा होता आया है। अब इसे ब्राह्मणवाद का मजबूत शिकंजा कहें या चेतना का अभाव, पहचान की आश्वस्ति यात्रीजी में है पर सरजुग में उसकी कमी पाई जा रही है।

यात्रीजी की आश्वस्ति तो कुछ इस रूप मैं अभिव्यक्त हुई है– ‘यश-अपयश हो हानि-लाभ हो सुख हो अथवा शोक।  सबसं पहिने मोन पडइ अछि अपने भूमिक लोक।’  ( प्रसंग चाहे यश का हो या अपयश का, हानि का हो या लाभ का, सुख की बात हो चाहे शोक की, सबसे पहले अपनी ही जमीन पर के लोग याद आते हैं। ) अब, इसमें बहुत तर्क करने की गुंजाइश नहीं है कि यात्रीजी की अपनी जमीन कौन-सी है।

( ४ ) व्यक्ति अथवा वस्तु की अपनी खास निजता में जो सौन्दर्य होता है, यात्रीजी ने हमेशा उसे ही काव्यानुभूति में रूपान्तरित करने की चेष्टा रखी। कवि-समाज के लिए यह बहुत प्रचलित तथ्य की तरह रहा है कि जब वह किसी ‘वस्तु’ को उठाता है तो उसमें बहुत-कुछ जोडता-घटाता है और तब उसे साहित्य में संस्थापन-योग्य बनाता है। भारतीय काव्य-परम्परा में इसे ‘अन्यथा-निवेशन’ कहा गया है। इस प्रक्रिया में वह क्या करता है कि या तो ‘वस्तु’ के स्वरूप में अपना ‘कथ्य’ मिलाकर उसे उदात्त बना लेता है या उसकी अपनी निजता में ही इतना अतिरेक मिला देता है कि वस्तु उदात्तीकृत हो जाती है। मेरे खयाल से अन्यथा-निवेशन के ये दो प्रारूप हैं।

यात्रीजी ने इस मामले में ऐसी प्रयुक्ति अपनाई जो न केवल मैथिली कविता के लिए एक दुर्लभ घटना की तरह है अपितु सम्पूर्ण भारतीय साहित्य के लिए एक रेखांकनीय बात है।

उनकी कितनी ही कविताओं में नितान्त छोटी-छोटी चीजें, तुच्छ नगण्य व्यक्ति और वस्तुएं अपनी सम्पूर्ण निजता में प्रकट होती हैं। गौर करने की बात है कि ये चीजें किसी प्रतीक, दृष्टान्त या उपमान के तौर पर नहीं आतीं। आलंकारिक शोभाख्यान के लिए कारीगरी दिखाने के लिए कवि इन्हें नहीं उठाता। वे अपने में अपनी सम्पूर्ण निजता, परिपूर्णता समेटे हुए आती हैं। ‘विकट प्रान्तर में खडा ताड का वृक्ष’ चला आता है। स्वयं में मस्त ‘चिडिया-चुनमुन’ चली आती हैं। भरे-पूरे थनोंवाली ‘मादा सूअर’ आ जाती है तो कहीं ‘सुन्दर राउत’ खुद में एक परिपूर्ण कविता का रूप धरे प्रकट होते हैं। और, ऐसी ‘क्षुद्र वस्तुओं’ के की चर्चा के मध्य बीच-बीच में कहीं ‘कविता’ पाई जाती हो, ऐसी बात नहीं। कविता कहीं अलग से नहीं होती। किसी उपमान का कोई उपमेय नहीं होता। ये सब स्वयं में एक पूर्ण कविता होते हैं- निजता की सुरभि से महमहाती।

यात्रीजी की अभिव्यक्ति में जो गँवारूपन है, प्रसंगवश उसपर भी एक नजर डालनी चाहिए। गँवारूपन का मतलब है कि किसी बात को जब वह उठाते हैं तो अत्यन्त साधारण आदमी की अभिव्यक्ति-शैली में उठाते हैं और इस क्रम में शिष्टजनानुमोदित अभिव्यक्ति-कला से दूर चले जाते हैं। शास्त्रीय मर्यादा को प्रमाण माननेवाले लोगों के लिए उनका यह ‘विचलन’ कष्टप्रद होता है। अपने शब्दों में मैं इस बात को स्पष्ट करूं, इससे कहीं ज्यादा मुझे वरिष्ठ कवि-गद्यकार पं० चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’ के एक लेख का कुछ अंश उद्धृत करना अच्छा लग रहा है। ‘भारती-मंडन’ के संस्मरण-विशेषांक में अमर जी का लेख है–‘यह यथार्थवादिता वांछनीय?’

इस लेख में अमर जी ने बहुत स्पष्टता के साथ अपनी बात रखी है, जो यात्रीजी को समझने में हमारे लिए मददगार हो सकती है। उनके एक कवितांश– ‘अपने छला मूर्ख हमरा चारि अक्षर पढा गेला बाप, जे बौआ कमा क’ लगा देता टाल’ –को उद्धृत करते हुए अमर जी कहते हैं–‘सिर्फ स्पष्टतावादी कहलाने लिए ‘बाप’ को ‘मूर्ख’ कहनेवाला पुत्र क्या कभी सुपुत्र कहला सकता है?  शब्दशक्ति के मर्मज्ञ यात्रीजी ने जिस दिन ‘निरक्षर’ के बदले ‘मूर्ख’ शब्द का प्रयोग किया, मेरा चित्त उसी दिन भटक गया। सम्बन्धी होने के गौरव को ठेस लगी।(दोनों के बीच मामा-भांजे का सम्बन्ध था।) चालीस वर्ष से अधिक हुआ कि ‘सारिका’ हिन्दी मासिक में ‘आईने के सामने’ स्तंभ में उनका साक्षात्कार छपा था। उसे पढकर उनके अनन्य मित्र, सभी स्थितियों में सामंजस्य रखनेवाले, शान्त, मृदुभाषी श्रीयुत सुमानजी-सदृश व्यक्ति का मन भी वितृष्णा से भर गया था। मुझसे भेंट हुई तो बोले थे–‘इससे उपलब्धि क्या? कुछ भी थे पिता, पिता हैं। क्षणिक लोकप्रियता के लिए यह यथार्थवादिता वांछनीय है? या स्पृहनीय? या अनुकरणीय?’

कुल मिलाकर बात यह कि यात्रीजी की इस ‘यथार्थवादिता’ ने इन तीनों के बीच के रिश्ते में दरार पैदा कर दिया।

गौर करने की बात है कि अमर जी जिसे यहां यथार्थवादिता कह रहे हैं, वह वस्तुतः ‘यथार्थवादिता’ नहीं है। यह तो महज अभिव्यक्ति का गँवारूपन है जिसे काव्यशास्त्र ने ग्राम्य-दोषादि की  कोटि में रखा है। जब वह यात्रीजी को ‘शब्द-शक्ति का मर्मज्ञ’ बताते हैं तो स्वाभाविक रूप से उनसे यह उम्मीद करते हैं कि वह शिष्ट-जनानुमोदित भाषा-शैली का प्रयोग किया करें। और जब सुमन जी इसे मात्र ‘क्षणिक लोकप्रियता’ का दरजा देते हैं तो क्या प्रकट करते हैं? जिस आम आदमी की अभिव्यक्ति-शैली तक साहित्य में लाना उन्हें पसन्द नहीं, उस आम आदमी के जीवन और सौन्दर्यशास्त्र का भला क्या मूल्य हो सकता है उनकी दृष्टि में?

अमर जी के उपर्युक्त उद्धरण में जो मांग प्रकट हुई है, वह शुद्ध ब्राह्मण-दृष्टि का द्योतक है। ब्राह्मण-दृष्टि, जिसके लिए मैथिली में प्रचलित शब्द है- परम्परावाद अथवा शुद्धतावाद, (दोनों ही नामों में किन्तु अव्याप्ति-दोष है)-इस बात से परहेज नहीं करता कि साहित्य में दीन-दलितों का प्रवेश हो, वह खूब हो, हो लेकिन ब्राह्मणवाद की शर्त पर। जीवन भले आम आदमी का रहे, पर उसमैं श्वास ब्राह्मणवाद का पडना चाहिए।

भले मिथिला के लोग आम बोलचाल की भाषा में भी पिता को ‘बाप’ और निरक्षर को ‘मूर्ख’ कहते हैं तो कहें। वह यहां विचारणीय नहीं है। विचारणीय यहां यह है कि ऐसा साहित्य में कहा जाना चाहिए या नहीं। यानी कि प्रश्न यथार्थ का नहीं, आदर्श का है। ब्राह्मण-दृष्टि को जो यथार्थ चाहिए उसे आदर्श से सराबोर होना चाहिए। इधर यात्रीजी थे कि उनके लिए यह मान्यता दो कौडी की भी नहीं थी। वह शब्द-मर्मज्ञ थे तो इसलिए थे कि कवि को हर कुछ होना चाहिए। लेकिन क्या शब्द-मर्मज्ञता ही कवित्व-बीज है? काव्यैककारण है?  और, जो लोग यह खयाल रखते हैं कि यात्रीजी क्षणिक लोकप्रियता के लिए ऐसा लिखते थे, वे दयनीय हैं क्योंकि वे नहीं जानते कि हिन्दी में अपनी जगह बनाने के लिए उन्हें कितना संघर्ष करना पडा था।

कहना चाहिए कि जिस तरह मार्क्सवाद की पुस्तकें पढकर यात्रीजी को नहीं समझा जा सकता उसी तरह ब्राह्मणवादी यथार्थ-दृष्टि रखकर भी उनके साथ न्याय नहीं किया जा सकता। पर, ऐसे न्याय की जरूरत ही उन्हें कहां है?

( ५ )ब्राह्मणवाद को कौन-सा यथार्थ चाहिए, यह बात जिस तरह उनके लिए कोई मायने नहीं रखती थी, उसी तरह यह बात भी कि पोलित ब्यूरो को किस प्रकार का लेखन चाहिए। लेकिन मायने रखे न रखे, वह इन प्रश्नों से निस्तार नहीं पा सकते थे। वह दोनों से जुडे थे। दोनों के बीज उनके भीतर थे या होने की संभाव्यता रखते थे। कुछ तो सांस्कारिक कुलक्रम में उनके भीतर आ विराजा था और कुछ स्वार्जित संबल के रूप में उन्होंने जमा कर रखे थे। शास्त्रीय साहित्य का जो गहरा अवबोध उन्होंने पाया था,उसकी अपनी जटिलताएं भी कम न थीं। मामला यह कि वह दोनों ओर से घिरे थे। दूसरी ओर उनका ‘मध्य मार्ग’ था, जो दिनानुदिन लोकमुखी,बंचितमुखी होते जाने को बाध्य था। यह बाध्यता उनके निजत्व की ही बाध्यता थी। उनका ‘यात्रीजी’ होना ही इस बाध्यता का मूल कारण था।

उनके साहित्य में हम देखते हैं कि वह अक्सर अपने आप पर हंसते हैं। खुद को ही ‘गिदराभकोल’ से लेकर ‘चूतिया’ तक साबित करते रहते हैं। उनके ऐसा करने की आखिर क्या संगति हो सकती है?  ऐसा करने की अनुमति तो न ब्राह्मणवाद देता है, न वामपंथ। अरे भाई, चूतिया बनाना है तो अपने प्रतिपक्षी को बनाओ न। लेकिन स्वयं को ही बना रहे हो? यह तो निरा पागलपन हुआ न?

मुझे लगता है कि स्वयं पर व्यंग्य करने की उनकी यह प्रवृत्ति दरअसल उनके निजत्व का विद्रोह है। भीतर जो वास्तविक आदमी है, उसका विद्रोह। लेकिन यह विद्रोह क्यों? विद्रोह होता ही तो है इसीलिए कि कोई किसी को दबा रहा हो, सता रहा हो, उसके वजूद को कमजोर कर रहा हो। लेकिन, यात्रीजी को दबानेवाला, सतानेवाला यह कौन है कि उन्हें विद्रोह पर उतारू होना पडता है?  मुझे लगता है कि वे यही दोनों वीर हैं–ब्राह्मण-दृष्टि और मार्क्सवाद। आप चाहें तो इसे ‘परम्परा’ और ‘आधुनिकता’ का नाम दे सकते हैं। आप गौर करेंगे कि जहां कहीं उन्होंने खुद पर व्यंग्य कियाहै, क्रूर प्रहार किया है, वह दरअसल अपने मोह के प्रति विद्रोह है– मोह कहीं ब्राह्मण-दृष्टि का, कहीं वामपंथी निष्पत्तियों का।

मैं यह कहने की अनुमति चाहूंगा कि यात्रीजी अपनी मनोरचना के स्तर पर स्वयं दलित-बंचित समुदाय से थे, दलितों, पीडितों की पीडा इसीलिए उन्हें निजता के हद पर आकर छूती थी और इसीलिए तुच्छ-नगण्यों के प्रति अपनी सघन पक्षधरता वह इतनी निरन्तरतापूर्वक बनाए रख सके। किसी-न-किसी तल पर वह स्वयं बन्धनग्रस्त थे, तभी इतने सातत्यपूर्वक मुक्ति की आकांक्षा को अभिव्यक्त करते रह सके। स्वयं अपनी मावीय कमजोरियों के प्रति आशंकित थे, इसीलिए स्वयं को भी क्षमा न करते हुए व्यंग्य का विषय बनाते रहे।

अन्त में, कुछ बातें, जो उनकी कविताई का स्वभाव बताती हैं और उनकी वैचारिकता के पहलू उजागर करती हैं–

हम पाते हैं कि अपनी साहित्य-यात्रा में यात्रीजी लगातार निम्नतरोन्मुख होते गए हैं। आम तौर पर लोग स्थूल से सूक्ष्म की यात्रा करते हैं, उन्होंने निम्न से निम्नतर की यात्रा की है। यह चीज हमें उनके काव्य-विषय के चयन में भी दीखती है और क्षुद्र-नगण्यों में जीवन-संवेदना खोजने की कलाकारी में भी। आरम्भ में हम उन्हें गंडकी के कछेर में गाय-भैंस चराते कालिदास और विद्यापति का अवलोकन करते पाते हैं और आगे मादा सूअर के सघन मातृत्व का निरीक्षण करते।

इसी प्रकार, ‘वर्ग’ की अवधारणा को स्वीकार करने के बावजूद वह ‘वर्ण’ की जटिलताओं से भी किनारा नहीं करते। वस्तुतः मिथिला की सामाजिक बुनाबट को समझना ‘वर्ण के भीतर वर्ण’ के परिप्रेक्ष्य को समझे बगैर नहीं हो सकता। भारत जिस दिन आजाद हुआ था, १५ अगस्त १९४७ को उन्होंने आजादी के उमंग में एक कविता लिखी थी-‘वंदना’। इसमें हम उन्हें बहुत सारे स्वप्न बुनते और दुआएं करते हुए देखते हैं। देश की आजादी से कई सारी अच्छी चीजें होंगी,उनका क्रमवार विवरण कविता में दिया गया है। सबसे पहली और अच्छी जो बात होगी, यात्रीजी कहते हैं, वह यह होगा कि ब्राह्मण-क्षत्रिय-भूमिहार आदि ऊंची जातियों के साथ-साथ शूद्र और अंत्यज जातियों के लोग भी अब ‘मैथिल’ मान लिए जाएंगे। इन जातियों की एक लंबी सूची उन्होंने इस कविता में दी है। मिथिला के इतिहास से जो अवगत हैं, उन्हें पता है कि आधुनिक युग में मिथिला की अधोगति का मुख्य जिम्मेवार दरभंगा राज की विभेदमूलक और शोषणपरक नीति है। लंबा वृत्तान्त है इसका, कि किस तरह ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ को ही ‘मैथिल’ होने की सुविधा प्राप्त थी और नवजागरण के दौर में कैसे अन्य जातियों ने ‘मैथिल’ का दरजा हासिल करने के लिए संघर्ष किया लेकिन उनकी एक न चली और अन्ततः सामाजिक एकता एक स्वप्न बनकर रह गई।

मुझे हमेशा से लगता रहा है कि यात्रीजी एक नायक-विहीन जाग्रत समाज की सोच रखते थे। उनकी कविताओं में और उनके उपन्यासों में नायक तो जरूर हैं पर उनकी वैचारिकता नायकत्व का अन्त चाहती है। याद आता है कि ‘बलचनमा’ के प्रकाशन के तीन दशक बाद जब किसी ने उनसे पूछा था कि ‘आपके बालचन का अब क्या हाल है?’ , तो तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया था–‘होगा साला कहीं किसी गांव का मुखिया-सरपंच बना बैठा।’ तो, नायक उन्होंने खडे किए, यह प्रतीकात्मक बात थी, कामचलाऊ बात थी,चाहते तो वह नायक-पूजा का अन्त थे।

नायक का उद्देश्य है–मार्गदर्शन, और उनकी कविता का स्वभाव हम देखते हैं कि वह जनता के सद् विवेक को मात्र उसका असली मार्गदर्शक कबूल करने के पक्ष में हैं।

यहां उनकी कविता ‘सुन्दर राउत’ मुझे याद आ रही है। उस कविता के अन्त में वह सुन्दर को सलाह देते हैं कि तुम अपनी मूछें छोटी करवा लो। क्या कहना चाहते हैं वह?  हार मान लेने?  समझौता कर लेने?  उस कविता की व्याख्या करते हुए और इसे ‘दलित-संघर्ष का ही नहीं, संघर्ष की विजयी मुद्रा का भी पता बताती कविता’ कहते हुए मोहन भारद्वाज इस कूटनीतिक सन्दर्भ का हवाला देते हैं कि ‘दो कदम आगे बढने के लिए एक कदम पीछे खिसकने मैं कोई हर्ज नहीं है।’  भारद्वाज जी इस बात पर खास ध्यान देने का आग्रह करते हैं कि यात्रीजी ने मूंछें छोटी करवाने कही हैं, कटवा लेने नहीं। लेकिन, मुझे लगता है कि जिस निष्पत्ति के अर्थ में उन्होंने कहा है,वहां मूछें छोटी करवाना या कटवा ही डालना, इन दोनों में अन्तर नहीं है। यह यात्रीजी की नमनीयता और नई पीढी के साथ अतिरिक्त स्नेह के कारण ही हो सकता है कि उन्होंने मूछें छोटी करवाने कही है, कटवा लेने नहीं।

मूछें कहां श्लाघ्य, कहां उपेक्षणीय– इसके सद् विवेक का होना मूल बात है। जहां कर्मकाण्डों में उलझकर दलित ब्राह्मणवाद की मौत मर रहे हों, वहां एक जागन्त कवि के लिए कर्मकाण्ड का निषेध नहीं करना चेतना के साथ गद्दारी करना है। तभी तो अपनी आखिरी कविताओं में से एक ‘मायावती’ में उन्होंने कहा था–‘मायावती मायावती दलितेन्द्र की छायावती’। मूछों का श्लाघ्य या उपेक्षणीय होना दरअसल असली और नकली के मामले से जुडा है। और उनकी दृष्टि में असली-नकली की पहचान एक सातत्यपूर्ण जागरूकता की मांग करता है। सतत जागरूकता और सद् विवेक–ये ही बंचितों के मार्गदर्शक हैं।

उन्होंने जहां कहीं दलित-बंचितों को अपनी कविता में उठाया, आप पाएंगे कि उनके ‘वर्तमान’ में ‘भविष्य’ का संकेत भी मिला दिया और, इसे उनका यथार्थ बताया। उन दलित-सीदित-पीडितों को आप कहीं भी डरे-छिपे-थरथर कांपते नहीं पाएंगे, चाहे वे शासन की बंदूक के सामने खडे हों चाहे सामन्तों के गिरोह के सामने। अब, यहां यदि आपको ‘अन्यथा-निवेशन’ सिद्धान्त याद आए तो चलिए, यह भी ठीक है। यात्रीजी का तो जैसे जीवन-संकल्प है–‘रहि जेतइ अव्यक्त-किए ककरो चित्र? हेतइ नहि लिपिबद्ध किए ककरो बोल?’ ( वह चाहे कितना भी तुच्छ हो, किसी का चित्र अव्यक्त क्यों रह जाए? किसी की भी बोल लिपिबद्ध होने से क्यों बची रह जाए? )

Advertisements

परम्परा आ लेखक – डॉ० तारानन्द वियोगी

अहां पुछलहुं अछि जे परम्पराक प्रति नवतुरिया लेखकक की रुख हेबाक चाही। हमर जबाव अछि जे अपन परम्पराक प्रति हमरा लोकनि मे आलोचनात्मक आस्था हेबाक चाही। प्राथमिक बात ई अछि जे आस्था हेबाक चाही। से आस्था केहन हेबाक चाही, से भिन्न बात थिक।

ई ‘आस्था’ शब्द बड व्यापक। सामान्यतः एकरा विश्वासक लगीच क’ क’ देखल जाइ छै। लोक कहितो अछि–आस्था-विश्वास। दुनू शब्द मे मुदा, बड अंतर। विश्वास तॅ लोक ओहुनो, विना कोनो कारणोक, क’ सकैत अछि, करिते अछि। मुदा, ‘आस्था’क लेल ‘ज्ञान झाक योग पडब’  आवश्यक। माने, बौद्धिक स्तर पर ओकरा प्रति अहां सजग होइऐक, तखन भेल–आस्था। अपन परम्पराक प्रति हमरा आस्था हेबाक चाही। से आस्था केहन, तॅ आलोचनात्मक। तात्पर्य जे नीक कें ग्रहण करबाक आ अधलाह कें त्याग करबाक बुद्धि आ साहस हमरालोकनि मे हेबाक चाही।

 

आधुनिक मैथिली साहित्यक जन्म कोना भेल?  एकर उत्स के मूल प्रेरणा की छल?  खोज कयला पर देखबै जे आरंभिक दशकक लेखक लोकनिक इष्ट छलनि–अपन परम्परा मे सुधार। एही दुआरे एहि युग कें सुधारवादी युग कहल गेलै। एकर मूल प्रेरक छल–भारतीय नवजागरण। भारतीय नवजागरणक जे प्रभाव मिथिला पर देखार रूप मे पडलै, तकरे हम ‘मैथिली जागरण’ कहैत छिऐक। एकरे बदौलत हमरा लोकनि कें आधुनिक मैथिली साहित्य प्राप्त भेल। प्रश्न अछि जे सुधार के जरूरति ककरो किएक पडैत छैक?  पहिने सॅ जे परम्परा चलि आबि रहल अछि, ताहि मे जखन निघेंस वस्तु सभक मात्रा बढि जाइ छै, तखन सुधारक जरूरति पडैत अछि। ई निघेंस वस्तु सभ मृत आ गतिहत्या करैबला होइत अछि। एकरा देखार करब साहित्यक मूल दायित्व, एही प्रेरणा सॅ आधुनिक मैथिली साहित्यक आरम्भ भेल अछि। सुधारवादी साहित्यक चरम विकास हमरा लोकनि हरिमोहन झाक साहित्य मे देखैत छिऐक। निघेंस वस्तु सभ कें ओ सर्वाधिक त्वराक संग आ बेस निर्मम ढंग सॅ देखार केलनि, तें हुनकर साहित्य एतेक महत्वपूर्ण अछि। आगू चलि क’ जबाना बदलि गेलै। सामाजिक सुधार भेलै। जबाना जे बदलैत अछि, ताहि मे साहित्योक अपन विलक्षण योगदान जरूर होइ छै। मुदा असल कारक होइत अछि–युग-प्रवृत्ति। युग-विशेषक जे ध्वनि होइ छै से तमाम माध्यम सभ सॅ एक्कहि संग अनुगूंजित होइ छै। एक जिम्मेदार लेखक सॅ ई आशा कएल जाइ छै जे ओ बदलैत युगक ध्वनि कें ठीक-ठीक अकानय, अखियास करए। पॉजीटिव आ निगेटिव तत्व सभ कें बेराबए। पॉजीटिव कें प्रोमोट करए आ निगेटिव के तर्कसंगत ढंग सॅ खंडन करए। दोसर एकटा रस्ता छै जे युगक पॉजीटिव ध्वनि मे जे सौन्दर्य, जे आदर्श निहित छै, तकरा अपन रचनाक माध्यम सं प्रकाश मे आनए। यात्रीजी यैह काज केलनि।

 

आगू चलि क’ अपन साहित्य मे एकटा एहनो युग आएल, जखन परम्पराक सम्पूर्णतः निषेधक मांग कएल गेल। जतेक गतिहत समाज छल मिथिलाक, तकरा देखैत ‘सामाजिक सुधार’ कें ई लोकनि पर्याप्त नहि मानैत छलाह। हिनका लोकनिक मतें आवश्यकता छलै- सामाजिक परिवर्तन के। ई पीढी बहुत पढल-लिखल लोकक पीढी छल। ई लोकनि प्रश्न उठौलनि जे परम्परा माने की?  एकटा सडल लहास, जाहि मे सुधारक आशा क्यो बताहे लोक क’ सकैत अछि। परम्परा जॅ किछु थिक तॅ किछु सुविधाभोगी लोकक इच्छा-पूर्ति आ विलासक साधन थिक। ओ लोकनि कहलनि जे युगक संग चलबाक लेल सामाजिक परिवर्तन आवश्यक थिक। व्यापक समाजक हित एही सॅ सधि सकैत अछि। एहि पीढीक नेतृत्वकर्ता राजकमल चौधरी छला।

 

ध्यान सॅ जॅ अहां देखब तॅ पाएब जे बात ई बहुत उचित आ व्यावहारिक छल। कतेक डोज के दबाइ पडबाक चाही, ई एहि बात पर निर्भर करैत अछि जे रोग कतेक जडिआएल अछि। मिथिलाक रोग ततेक जडिआएल छल जे निषेधक मांग जरूरी छल। युगक संग चलबाक लेल अहां तैयार नहि छी, कारण जे बाप-ददा सॅ अहां कें बहुत मोह अछि। ई परम्पराक बचल रहबाक कोनो तर्क तॅ नहि भेलै। माने जे तर्कहीनता। परम्परावादी लोकनिक सब सं प्रधान तर्क थिक–तर्कहीनता। ओ लोकनि एही पर प्रहार केलनि। आब हमसब युगक समक्ष ठाढ छी तं अपन पूर्वज लोकनिक आशय कें बुझैत छी। निशां मे मातल समाजकें चेतेबाक लेल पूर्ण निषेधक नारा जरूरी छै। ओ लोकनि ठीक कहै छला। मुदा जुलुम बात जे हुनका लोकनिक रचना कें देखू तॅ परम्परा ओहूठाम विद्यमान भेटत। अपन सम्पूर्ण निहितार्थक संग। मुदा कमाल, जे ओ परम्पराक निषेध केलनि। बेसी की कहू, आशय पर जेबाक चाही। कथित शब्दे टाक ओझरा मे फॅसबा सॅ बचबाक चाही।

 

आब हमसब साहित्यक द्वार पर ठाढ छी आ कहै छी जे  लेखक कें परम्पराक प्रति आलोचनात्मक आस्था सं परिपूर्ण हेबाक चाही। सुधारक फेज बीति चुकल अछि। आब सुधार कएल नहि जा सकैछ। निषेध सेहो उचित नहि थिक, कारण हमर परम्परा आइ मात्र परम्परा नहि रहल, हमर अस्तित्वक अस्मिता(identity)बनि गेल अछि। एहि भूमंडलीकृत आ बाजारवादी समय मे जॅ हमसब जीयब, आ अपन पहिचान ताकब तॅ से हमर परम्परा टा, सैह टा भ’ सकैत अछि। आब परम्पराक निषेध नहि, ओकर पॉजीटिव तत्व सभक समाहार चाही हमरा, हमर अपन पहिचान प्रतिख्यापित करबाक लेल, सौंसे दुनियां मे। एहना स्थिति मे की करबाक चाही?  नीक कें पकडबाक चाही, अधलाह कें छोडबाक चाही। विना कोनो मोहक। विना कोनो ममताक।

 

मुदा, प्रश्न अछि जे परम्परा माने कोन परम्परा?  ध्यान सॅ देखबै तॅ पाएब जे परम्परा कौखन एकटा नहि होइ छै। सभ युग मे ई चलन रहल अछि जे एकटा जॅ मुख्यधाराक परम्परा, तॅ दोसर अवान्तर परम्परा अथवा अतःसलिला परम्परा। एकटा खिस्सा हमरा एहिठाम मोन पडैत अछि। खिस्सा थिक शान्तिनिकेतनक। गुरुदेव टैगोर के युगक। एकबेर की भेल जे आश्रम मे काज कर’ बाली एक विधबा ब्राह्मणी युवती एक आन स्टाफ सॅ प्रेम करै छली। रवीन्द्रनाथ एहि प्रेम कें लक्ष्य करै छला। रवीन्द्रनाथ कें चिन्हैत छियनि? आधुनिक भारतीय साहित्यक ओ एहन अनुपम लेखक थिकाह, जिनका मे परम्परा, राष्ट्रीयता आ वैश्विकता–तीनूक तूलमतूल संतुलित विकास हमरा लोकनि कें भेटैत अछि। सही माने मे ओ एक ‘भारतीय लेखक’ छला। आ, से रवीन्द्रनाथ शुद्ध हृदय सॅ चाहै छला जे जॅ संभव हो तॅ एहि दुनूक विवाह भ’ जेबाक चाही। मुदा संकट ई जे ब्राह्मण-समाज मे विधवा-विवाह मान्य नहि। व्यवस्था जॅ क्यो देताह, तॅ से क्यो पंडिते। गुरुदेव आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कें बजौलनि। हजारी बाबू महान लेखक तॅ छलाहे, तकरा संग-संग बड भारी ज्योतिषी सेहो छला आ ‘पंडितजी’क नामें मशहूर छला। गुरुदेव पुछलखिन–विधवा-विवाहक संबंध मे अपन परम्परा की कहैत अछि?  पंडितजी शास्त्र सभक अवलोकन केलनि आ जा क’ कहलखिन–शास्त्र आज्ञा नहि दैए। गुरुदेव मुदा, बहुत सहानुभूतिपूर्ण छला। बजला–पंडितजी, कोन परम्परा आज्ञा नहि दैए? अहां तॅ कोनो एक परम्पराक बात बात कहैत छी। सभ परम्पराक तॅ अपन-अपन मान्य आचार्य सभ छथि। हम ई कोना कहि सकै छी जे एक परम्पराक आचार्य हमर आदरणीय आ दोसर परम्पराक आचार्य निषेध्य?  कने देखि क’ कहू जे दोसर परम्परा की कहैए? अगिला दिन हजारी बाबू दोसर-दोसर परम्पराक आचार्य लोकनिक मतक परायण केलनि आ गुरुदेव कें जा क’ कहलखिन जे दोसर परम्परा विधवा-विवाहक अनुमति दैए। गुरुदेव कें मानवताक हित मे आ युग-धर्मक अनुरूप जे करबाक छलनि, तकर रस्ता भेटि गेल छलनि।

 

हमरा लोकनि कें एतबा बुद्धिमान आ विवेकपूर्ण हेबाक चाही जे अपना ओतक समस्त परम्परा हमरा अपन परम्परा बुझना जाय। ब्राह्मण हएब, आ कि ब्राह्मण नहि हएब हमर बिलकुल निजी मामिला थिक। तहिना, जेना हम राति कें पैजामा पहिरि क’ सुतै छी कि लुंगी पहिरि क’, ई हमर निजी मामिला छी। युगधर्मक उपेक्षा नहि करबाक चाही। दुनू परम्परा हमर अपने परम्परा थिक। कट्टर सनातनी हेबाक जे थोडेक हानि सभ छैक, तकरा सॅ आब हमरा लोकनि कें मुक्त हेबाक चाही, ई बात जखन हम कहै छी तॅ किछु लोक हमरा विरोधी बुझैत छथि। मुदा ताहि डर सॅ की हम ई बात कहब छोडि दी जे एकैसम शताब्दीक एहि संश्लिष्ट युग मे हमरा लोकनि कें टिकल रहबाक लेल कोन रणनीति विधेय थिक। दुनू परम्परा हमर अपन परम्परा थिक, जे हमरा युगानुरूप समायोजन लेल पॉजीटिव सजेस्ट करय, से ताहिकाल हमरा लेल विधेय थिक। मिथिलाक समन्वित परम्पराक हम अन्वेषी थिकहुं। सौंसे मिथिला हमर अपन मिथिला थिक। हमर जे समन्वित परम्परा अछि, तकर संरक्षण आ विकासक वास्ते हमरा अग्रसर हेबाक अछि। से आलोचनात्मक आस्था राखि क’। हमरा लोकनि जॅ समाजक जागरूक वर्ग छी, तॅ हमर यैह कर्तव्य थिक।

एखन चहुंदिस उत्तर-आधुनिकता (post modernism)  के खूब हल्ला मचल छै। कहियो अखियास केलियैए जे ई कोन चीज थिक आ एकर दार्शनिक आधार-भित्ति की छिऐक?  हम तॅ सनातन सॅ चलि आबि रहल काल-प्रवाह कें देखै छी तॅ लगैए जे ई दुनियां लगातार वर्ग-न्याय दिस बढि रहल अछि। पहिने सामंतवादक युग छल। थोडेक लोक ऐश्वर्य-मदमत्त छला आ बहुसंख्यक लोक न्याय सं बंचित छल। युग बदलल तॅ तखन आधुनिकता आएल। एहि बहुसंख्यक न्याय-बंचित लोक मे सॅ थोडेक कें न्याय भेटलैक। मुदा की सभ कें भेटि सकलैक?  जतेक लोक आबो न्याय-बंचित रहि गेला, तिनका अहां ‘बहुसंख्यक’ सॅ कम की कहबै?  आधुनिकताक तॅ सेहो अपन जटिलता छै। लोकतंत्री शासन आ व्यवसाय-मुखी विज्ञान नित्त एकर जटिलता बढौने जाइत अछि। तात्पर्य जे आधुनिकता सॅ सेहो समस्त मनुक्ख कें न्याय नहि भेटि सकलैक। एम्हर आबि युग-प्रवृत्ति देखैत छी जे जे कोनो वर्ग वा समूह आधुनिकताक मुख्यधारा मे नहि आबि सकल, छूटल-पिछडल रहि गेल, से सभ अपनहि कें अपन केन्द्र मानि, अपन अस्तित्व सॅ अपनहि संतुष्ट होइत, अपन दाबीदारी ठोकि देलक। दाबीदारी कथीक लेल?  आन कथूक लेल नहि। मात्र एही लेल जे अहांक सर्टिफिकेटक खगता हमरा नहि अछि। अहांक नीक कहने ने हम नीक आ खराब कहने ने हम खराब भ ‘ सकैत छी। हम जे छी, जेहन छी, स्वयं मे पूर्ण आ महत्वपूर्ण छी। एक तरहक स्वयंभू आत्मविश्वास एकरा अहां कहि सकै छिऐक। सौंसे दुनियां मे, सभ देश, सभ बंचित समुदाय मे आइ ई प्रवृत्ति देखल जा रहल छै। ई स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श आदि-आदि की थिक?  क्षरणशील पर्यावरणक चिन्ता, विलुप्त होइत जीवजन्तु-वनस्पतिक चिन्ता, अप्पन जडि कें चिन्हबाक चिन्ता– ई सभ की थिक? आजुक युगक प्रवृत्ति थिक। आधुनिकताक विफलताक पश्चात जे प्रतिक्रिया सभ सौंसे दुनियां मे भेल अछि, ई तकर देन थिक। मुक्त बाजार एकरा अपना लेल नीक बुझैए, से एक बात। दोसर दिस मार्क्सवाद एकरा शंकालुताक दृष्टियें देखि रहल अछि। कारण, एहि बात मे ओकरा संदेह बुझाइत छै जे एहि बाट पर चलने बंचित समुदाय अपना लेल न्याय प्राप्त क’ सकत। अस्तु, एहि पॉजीटिव-निगेटिव के तसफिया चिन्तक लोकनि अपन करथु। युग-प्रवृत्ति तॅ जे थिक, से थिक।

स्त्री-विमर्शेक प्रसंग कें लिय’। मिथिलाक गामो घर मे आइ अहां देखबै जे अहां छोट उमेर मे बेटीक बियाह करियौ तॅ स्वयं बेटिये अहांक प्रबल विरोधी भ’ क’ ठाढ भ’ जाएत। कहुना ठकि-फुसिया क’ जॅ अधलाह वर संग बियाह कराब’ लगियौ तॅ मडबा पर सॅ भागि पडाएत। अनजाति संग बियाह करबाक दंडस्वरूप जॅ ओकरा चांप चढा क’ मारि दियौ तॅ पुलिस-कचहरी तॅ छोडू, सौंसे दुनियांक समाज तेना क’ क’ अहांक दुश्मन भ’ जाएत जे लाख घूस-पेंच लगाइयो क’ बचि नहि सकब। एखन निरुपमा पाठकक हत्या-काण्ड मे यैह तॅ भेल अछि।

 

एहना स्थिति मे लेखकक की दायित्व थिक?  पहिने तॅ अहां पॉजीटिव-निगेटिव के निर्णय करू। आ, अहांक जे समन्वित परम्परा अछि, तकरा संग युगक पॉजीटिव ध्वनि कें जोडू। युगक मोताबिक जकर औचित्य बनैत होइक, तकरा अपन समर्थन दियौ। रचनात्मक लेखन (creative writing) मे ओकरा उतारू जे अहांक समाज एहि युगक संग कोन तरहें समायोजन बैसा सकैत अछि। की अहां कें बूझल अछि, यात्रीजी ‘लिव-इन-रिलेशनशिप’ के समर्थन केने छलखिन। आ, नवतुरिया लेखक लोकनि सॅ अपील सेहो केने छलखिन जे एकर सकारात्मक पक्ष पर ओ लोकनि कथादि लिखथु। मुदा, मैथिलीक ई दोसर पहलू सेहो देखू जे हमर चुनौटा मंचीय हास्यकवि, जनक जी महाराज जान-प्राण अडपि क’ स्त्री-विमर्शक विरोध करैत छथि,  जागरूक होइत स्त्रीक एक सॅ एक हास्यास्पद आ वीभत्स वर्णन क’ क’ पुरुख श्रोता लोकनि कें हॅसी लगबैत छथि। स्त्री लोकनि एहि पर की सोचैत हेती? अहां पुरुख छी तॅ स्त्रीक निन्दा तॅ करबे करबै। युग-युग सॅ करैत एलियैए। सोचू, एहि तरहें एकभग्गू भ’ क’ चलने की हम अपन घरोक रक्षा क’ सकब?  समाजक रक्षाक तॅ बाते छोडू। हम तॅ बन्धु, यैह कहब जे युग-प्रवृत्ति सॅ आंखि मूनि क’ हमरालोकनि युगक सामना नहि क’ सकैत छी।

 

अपन परम्पराक प्रति दृष्टिकोण कें हमरा लोकनि आलोचनात्मक कोना बनौने राखि सकैत छी, तकर एक बहुत सटीक दृष्टान्त एखन हाल मे सामने आएल अछि। ई पं० गोविन्द झाक नवीनतम शोधक परिणाम थिक। पं० गोविन्द झा कें अहां ‘चिन्है’ छियनि?  ओ आयुवृद्ध भने होथु, मुदा कोनो युवे-सन ओजस्वी-तेजस्वी छथि। उत्साह आ उत्सुकता सॅ एकदम भरल-पुरल छथि, जे हुनका सदति नव-नव संधान-अनुसंधान लेल प्रेरित करैत रहैत छनि। ओ विद्यापति-साहित्यक विशेषज्ञ छथि। हमरा मोन पडैए, आचार्य रमानाथ झा भारी मन सॅ कतहु लिखने छथिन जे विद्यापतिक विशेषज्ञ, समूचा संसार मे आब एक हमही टा बचि गेल छी, आन ककरो मे तकर प्रवृत्तियो नहि देखैत छिऐक। मैथिलीक सौभाग्य जे हुनका बादो, आइयो पं० गोविन्द झा-सन अनुसंधानी पुरुष हमरा लोकनिक बीच छथि। पंडित जीक एक नव पोथी एहि बीच बहार भेलनि अछि–‘अनुचिन्तन’। एहि पोथी मे एक लेख अछि–‘विद्यापतिक प्रसंग’। एहि लेख मे ओ विद्यापति-गीतक मादे अपन नवीनतम शोधक किछु निष्कर्ष प्रस्तुत केलनि अछि।

 

हमरा लोकनि अवगत छी जे विद्यापति-गीतक छव गोट प्राचीन स्रोत अछि–रामभद्रपुर तालपत्र, नेपाल तालपत्र, तरौनी तालपत्र, भाषागीत-संग्रह, रागतरंगिणी आ हरगौरी-विवाह। हमरा लोकनि एहू बात सॅ अवगत छी जे मध्यकालीन मिथिला मे दर्जनो एहन ज्ञात-अज्ञात-अल्पज्ञात कविलोकनि भेला जे गीत-रचना केलनि। बाद मे हुनको लोकनिक गीत जे भेटल तॅ ताहि मे ‘भनहि विद्यापति’क भनिता जोडल अथवा विद्यापतियेक गीत-रचनाक रूप मे प्रसिद्धि-प्राप्त। हमरा लोकनिक परम्परा गौरवपूर्वक स्वीकार केलक जे ई सबटा गीत विद्यापतियेक छियनि। तखन, आब? आलोचनात्मक आस्था जॅ हो तॅ तकर मांग थिक जे हमर विशेषज्ञ लोकनि निर्णय करथु जे सत्य की थिक। पंडित जी सैह केलनि अछि। विद्यापति-गीतक निर्लेप पहिचान देखार करबाक लेल ओ एक कसौटी बनौलनि अछि। विद्यापतिक निर्विवाद प्राचीन गीत सभक तुलना मे अन्यान्य गीतक विश्लेषण जॅ ( 1)भाषा (2 )शब्द (3 )शैली (4 )अन्त्यानुप्रास (5 )भनिता मे पुनरुक्ति (6 )भाव (7 )आ, महाभाव– एहि सभक आधार पर कएल जाय, तॅ ठीक-ठीक निष्कर्ष निकालल जा सकैए जे कोन गीत विद्यापतिक थिक कोन नहि। पंडित जी सैह केलनि अछि। हुनक अनेक निष्कर्ष (कुल 48 सुप्रसिद्ध गीत कें ओ विद्यापति सॅ भिन्न कविक रचना मानलनि अछि) सभ मे सॅ एक निष्कर्ष ई थिक जे  ‘जय जय भैरवि’ विद्यापतिक गीत-रचना नहि थिक। तखन, आब? जानिते छी जे ई गीत मिथिला मे राष्ट्र-गीतक गौरव-गरिमा हासिल क’ लेने अछि। एकरा लोक तेना क’ विद्यापतिक गीत मानि लेलक अछि जे  सपनो मे नहि सोचि सकैछ जे ई विद्यापतिक गीत नहियो भ’ सकैत अछि। प्रायः एही परिस्थिति कें गमैत, पंडित जी अपन लेख मे ईहो विनम्र वचन जोडलनि–‘प्रथमदृष्ट्या तॅ इएह प्रतीत होइत अछि जे ई गीतसभ विद्यापतिक रचना नहि भए सकैत अछि। परन्तु हमरा से कहबाक साहस नहि होइत अछि किएक तॅ सम्भवतः हमरा छाडि प्रायः सभ कें प्रगाढ विश्वास छनि जे ई गीत विद्यापतिक रचल थिक। विश्वासे नहि, सभ कें एहि गीतसभ पर प्रगाढ आस्था सेहो छनि। हम कथमपि नहि चाहब जे कनिको आस्था पर चोट पडय।’

पंडित जी कें कहबाक साहसो भेलनि अछि आ हमरा लोकनिक आस्था पर चोटो नहि पडल अछि। कारण,  मात्र आस्था नहि, हमरा लोकनि अपन परम्पराक प्रति आलोचनात्मक आस्था रखैत छी। जे सत्य थिक, से तॅ अन्ततः सत्य थिक। आ, ओकर अपन लाभो तॅ छै। आइ धरि दुनिया कहैत छल–मिथिला कें विद्यापति छोडि क’ आर की छै?  पद्धतिबद्ध ढंग सॅ उद्घाटित सत्य दुनिया कें जवाब द’ सकैत अछि जे मध्यकालो मे, एक विद्यापतिये नहि, मिथिला कें बहुत किछु छलैक।

 

सम्पर्क–बदरिकाश्रम, महिषी,सहरसा 852216

मो० 9431413125

email– tara.viyogi@gmail.com

मेरे सीताराम(मैथिली कहानी)

जीप अगर बैलून-जैसी कोई चीज हुई होती, तो इतने लोगों के कसमा-कस में फूलकर कुप्पा हो जाती। लेकिन, इस निर्जीव यंत्र को कोई पीडा, कोई तकलीफ नहीं थी। तकलीफ थी जीप में बैठे लोगों को। कोई हिल-डुल तक नहीं सकता था। टांग सीधी करने के लिए कोई चिचिया रहा था। किसी की पीठ निश्चेष्ट हुई जा रही थी। कोई सिर सीधा होने देने के लिए बाजूवाले की मिन्नत कर रहा था। जीप में जो एक औरत बैठी थी, उसकी गोद का बच्चा रो-रोकर बेदम हुआ जा रहा था।

पढे-लिखे एक नौजबान ने अपना आक्रोश व्यक्त किया–‘साला ई बिहार सब दिन बिहारे रह गया।’ सेठ-जैसे दीखते एक बाबू ने अपना विचार प्रकट किया–‘ई सब इस लाइने का महिमा है। साला करें भी तो क्या करें?’  गाडी में बैठे एक बंगाली बाबू ने दायें-बायें देखकर मन की बात रखी–‘ई सब अगर हमारा इस्टेट में होता तो भीषोण हो जाता, भीषोण।’ जीप में ही एक तरफ मुचडे-सिकुडे बैठे थे एक सन्त जी। सबकी बात सुन लेने के बाद वह बोले–‘सीताराम सीताराम’।

सन्त जी बडी विपन्न दशा में थे। उन्होंने खद्दर की एक पुरानी बेडौल कमीज पहन रखी थी। कमीज के ऊपर एक पतली-सी चिक्कट मैली चादर ओढ रखी थी। मौसम बहुत सर्द था। ऐसा जाडा बरसों बाद पडा था। तीन दिन से धूप नहीं उगी थी। कलेजा चीड देने वाली ठण्डी हवा बह रही थी और कुहासे की वजह से रास्ता नहीं सूझता था।

सन्त जी  जब बोले–सीताराम सीताराम– तो मेरी निगाह उनकी तरफ गई। उनकी उमर पचास-पचपन की रही होगी। ज्यादातर बाल पक चुके थे। बडी-बडी बेतरतीब दाढी थी। उनके ललाट के चंदन-तिलक ने और उनकी आखों से टपकती निर्लिप्तता ने मुझे उनकी ओर खींचा।

सन्त जी जब फिर से बोले–सीताराम सीताराम–तो जाने क्या सूझा मुझे कि मुस्कुराने लगा। भई, यह तो जयश्रीराम का जमाना है, ये सन्त जी तो जमाने से पीछे चल रहे हैं। मुझे मजाक सूझा कि पूछूं–बाबा, अयोध्या-विजय नहीं करनी है कि सीताराम-सीताराम रटते हो? सीता को साथ लेकर चले राम, तब तो मिल गई विजय। सीता को गोली मारो बाबा, जयश्रीराम जपो।

लेकिन सन्त जी की आवाज मे अथाह दर्द भरा महसूस होता था। ‘सी’ से लेकर ‘म’ तक, मुझे लगा जैसे उनके खुद के जीवन का कोई कारुणिक महाकाव्य हो। सन्त जी का सूखा चेहरा, सरदी से काठ हो रही देह और उदास-फटेहाल आंखें जैसे उस महाकाव्य के विभिन्न अध्याय हों और मूर्तिमान हो उठे हों। मुझे अपना सवाल बेमानी लगा और ग्लानि हुई।

एक पैसेंजर चिल्लाया–‘हो मरदे ड्राइवर साहेब, अभियो गाडी खोलिएगा कि नहीं? हमलोग बेमौत मर रहे हैं।’

सवाल के जवाब में ड्राइवर ने एक मुस्टंड नौजवान से कहा–‘रे मुसना, चल बुक कर।’ हुक्म सुनकर मुसना वहीं से चिल्लाया–जयश्रीराम।

मुसना पास आया। सारे लोगों से वह किराये के पैसे वसूलने लगा। उसने चिल्लाकर कहा–‘सब कोइ खुदरा पैसा निकाल कर दीजिए।‘ मैंने हिटलर की आवाज नहीं सुनी है। लेकिन एक मोटा अनुमान है कि उसकी तरह की सोच का आदमी किस तरह हुक्म देता होगा। मुसना की चिल्लाहट सुनकर मुझे हिटलर याद आया। मुझे लगा कि अपनी-अपनी   जिन्दगी की चाहे गाडी की खलासीगिरी करता हुआ हर आदमी कहीं-न-कहीं हिटलर ही हो जाना चाहता है।

अब यह तो संभव था नहीं कि गाडी मे बैठे हर आदमी के पास जरूरत के मुताबिक खुल्ले पैसे होते। मुसना बमकता रहा। लोग चुप रहकर, हें-हें हिहियाकर, अगल-बगल झांककर अपनी-अपनी इज्जत बचाते रहे।

लोग बहुत तकलीफ में थे। जेब से पैसे निकालने के सिलसिले में जो उकस-पाकस शुरू हुई, उससे लोगों की तकलीफ और बढ गई। लेकिन, वे लाचार थे। हर हाल में उन्हें इसी गाडी से या इसी हालात में किसी दूसरी गाडी से सफर करना था।

बिहार सरकार का एक सिपाही मुसना की तरफ खी-खी हंसता हुआ बोला–‘हो भैबा, पैसा तो हमरा भीतरका बटुआ में है। चलिए, आगे दे देंगे। कोइ दिक्कतो?’

–‘जयश्रीराम हजूर। कोइ दिक्कत नहीं है। आप बैठिए।’–मुसना भी हंसने लगा। उसकी वह हंसी देखकर  बंगाली बाबू आंख मिचमिचाने लगे। तोंदवाले बाबू साहब दूसरी ओर देखने लगे। जीन्सवाला नौजबान दांत पीसने लगा। पर, सन्त जी बोले–‘सीताराम सीताराम’।

मुसना की हंसी का ही असर हो सकता है कि औरत की गोद का बच्चा जो अबतक चुप हो चुका था, फिर रोने लगा। बच्चा इतनी जोर से चिल्लाया कि सबका ध्यान उसकी ओर चला गया। मुसना का भी। वह ड्राइवर पर चिल्लाया–‘कह देते हैं गुरुजी, बच्चावाली औरतिया सब को गाडी में मत बैठाया कीजिए।’

दायीं तरफ की सीट पर एक अथबल वृद्ध बैठे थे। काफी देर से वह छटपट कर रहे थे। इस छटपटाहट का तब अर्थ लगा, जब मुसना ने उनसे किराया मांगा, और उन्होंने दीनतापूर्वक पांच का एक नोट मुसना की तरफ बढाते हुए कहा–‘हो बाबू, मेरा पाकेटमारी हो गया है। इतनेइ पैसा साथ में है। ले लीजिए।’

मुसना गरजकर बोला–‘हम क्या खरांत बांटते हैं बूढा। पाकेटमारी हो गया तो शान से गाडी पर आकर बैठा काहे? बाप का गाडी है?’

वह वृद्ध जरूर किसी दुर्दिन में फॅसे रहे होंगे। सबने देखा कि मुसना की डांट सुनकर वह रोने लगे। उनकी दोनों आंखें डबडबा आईं और बूंद-बूंद आंसू चूने लगे।

मुसना फिर चिल्लाया–‘रोने-पादने से कुछ होनेबाला नहीं है। पैसा नहीं है तो गाडी खाली करो।’

इसी बीच वहां ड्राइवर आया और समझौता हो गया। समझौते के अनुसार उस अथबल वृद्ध को गाडी की सीट खाली करनी पडी और उस भयंकर सरदी में जीप की छत पर उन्हें बैठा दिया गया।

एकाध पैसेंजर से अभी किराया लेना बाकी ही था कि बस-स्टैण्ड के एक किनारे से किसी ने मुसना को पुकारा–‘रे मुसना, दौडकर आ जा रे। माल खतम हो रहा है।’

मुसना उस तरफ दौड पडा। लोग सांसत में पडे रहे। औरत की गोद का बच्चा अब चुप हो गया था। सन्त जी सिर झुकाकर किसी चिन्ता-विचार में लगे थे। उनकी सोच में अब भी शायद सीताराम ही रहे होंगे।

गांजा के नशे में झूमता हुआ मुसना लौटा तो बहुत खुश था। बाकी बचे मुसाफिरों से  उसने बगैर मुंह खोले हाथ बढाकर पैसा मांगा। एक आदमी ने पैसा दे दिया। अब सन्त जी की बारी थी। सन्त जी बोले–‘हो सीताराम, चलिए। आगे चलिए। हम भी सिपाहिए जी के जरे पैसा दे देंगे।’

सन्त जी की बात पर मुसना चुप रह गया। उसने ड्राइवर से कहा–‘गुरुजी, गाडी खोलिए।’

पांच-सात मुस्टंड खलासियों के जोरदार धक्के और जयश्रीराम के कोलाहल से गाडी खुल गई और धीरे-धीरे सरकने लगी। मुसना गाडी के पीछे लटक गया और चिल्लाकर बोला–‘जयश्रीराम।’

जैसे-तैसे सरकती गाडी अपने गन्तव्य की तरफ विदा हुई। मुसाफिर दम साधे बैठे रहे और भव-सागर पार करने की मधुर कल्पना में अपनी तकलीफें भूले रहे।

पीछे लटका हुआ मुसना हर पांच-सात मिनट पर एक बार चिग्घाडता–‘जयश्रीराम।’ कभी किसी गाडी को देखकर चिल्लाता, कभी सडक पार करती किसी लडकी को देखकर।

सात-आठ किलोमीटर का फासला गाडी ने तय किया होगा, जब मुसना को याद आया कि एक मुसाफिर से पैसा लेना बाकी है। पीछे लटके-लटके ही वह जरा-सा झुका और सन्त जी की तरफ हाथ बढाकर बोला–‘बूढा, पैसा बढाइये।’

सन्त जी ने किराये के पैसे अपने हाथ मे निकाल रखे थे। बडे ही संकोच और दीनता के साथ उन्होंने पांच का एक नोट मुसना की ओर बढा दिया। मुसना बोला–‘दो रुपया और निकालिए।’

सन्त जी बोले–‘हो सीताराम, अब तो हमारे पास पैसा नहीं है।’

मुसना बोला–‘पैसा नहीं है तो गाडी पर चढ काहे गया?’

सन्त जी चुप रह गए।

मुसना भी थोडी देर चुप रहा। फिर अचानक जैसे उसपर कोई दौरा पडा हो, वह शुरू हो गया–‘ऐ दढियल, पैसा निकालो।’

सन्त जी फिर बोले–‘हो सीताराम, अब चाहे आप जो कर लीजिए, पैसा तो हमरे पास नहीं है।’

मुसना बमक पडा—मादरचो.. बुढबा। हमको सिखाता है? पैसा निकालेगा कि नहीं?’  और उसने सन्त जी का हाथ दबोच लिया।

सन्त जी ने हाथ छुडाने की कोशिश की तो मुसना और भी ज्यादा उग्र हो गया। उसने सन्त जी की दाढी पकड ली और नोचने लगा। फिर उसने सन्त जी का कान पकड लिया और बेतरह खींचने लगा। सन्त जी ने फिर प्रतिवाद किया तो वह झापड और मुक्के से उन्हें पीटने लगा।

मेरे लिए अब बर्दाश्त के बाहर हो रहा था। बर्दाश्त न करना भले ही आत्म-बलिदान के बराबर हो, पर उसका मौका भी तो कभी-कभी आता ही है। वह मौका आ गया लगता था। दुखद यह था कि गाडी में बैठे तमाम लोग टुक-टुक तमाशा देख रहे थे और चुपचाप थे। हर किसी की बोलने की ताकत जैसे बिला गई थी।

मैंने अपने सख्त हाथों से मुसना की कलाई पकड ली और निर्दयतापूर्वक उसे मचोडने लगा। इधर मेरे मुंह से धारा-प्रवाह गालियां निकल रहीं थीं। मुसना चिल्लाया–‘गुरुजी गाडी रोकिए।’

एक झटके के साथ गाडी रुक गई।ड्राइवर ने पूछा–‘क्या बात है रे?’ यूं उसे भी घटना का कुछ-न-कुछ अनुमान रहा ही होगा।

ड्राइवर के सवाल का जवाब मुसना दे, इसके पहले ही मैं पूरे फर्राटे से बोलने लगा–‘ई कौन तरीका है जी? पसिंजर को पैसा नहीं है तो उसको गाडी पर मत चढाबो, लेकिन उसको आप मारिएगा? जुलुम करते हैं आपलोग। देखिए, इस बेचारे सन्त जी को आपका खलासी कितना मार मारा है। अंधेर राज है, अंधेर राज।’

मुझे साफ लग रहा था कि अब ड्राइवर और खलासी दोनों मुझे पीटने लगेंगे। वे मुझे बेदम करके छोडेंगे। इस काम के लिए ये लोहे का रॉड रखे रहते हैं। तय था कि मेरी पिटाई होने लगे तो कोई भी मुझे नहीं बचाएगा। चूं शब्द तक कोई न बोलेगा। यही हमारी संस्कृति थी। मैं निपट अकेला था और बुरी तरह भयभीत भी। लेकिन यह भय ही जैसे मुझे ताकत दे रहा था।

–‘आप ही बताइए ड्राइवर साहब, ई कोनो तरीका हुआ?’–मैंने अपनी बात पूरी की। ड्राइवर ने आलाकमान की निगाह से एक बार मुझे देखा, फिर सन्त जी को, जो आतुर दृष्टि से उसी की तरफ ताक रहे थे। कहां क्या दिखाई पडा उसे, पता नहीं। उसने मुसना से कहा–पांच रुपया दिया है न? हो गया। छोड दो।’

और इस झगडे का असंभावित निपटारा हो गया। सन्त जी बहुत खुश हुए और सीताराम सीताराम रटने लगे।

लगभग एक घंटे बाद गाडी अपने गंतव्य स्थान पर पहुंची। सभी उतरे।

मैं सन्त जी के पास गया। वह अपनी चादर को कायदे से ओढ रहे थे।

मैंने पूछा–‘बाबा, किस गांव जाइएगा?’

वह बोले–‘लगे-पास में जाएंगे हो सीताराम। बासदेवपुर।’

मैंने उनसे कहा–बाबा, आपको तो ऊ खलसिया बहुत बेइज्जत किया। पैसा कम था तो पहले ही ड्राइवर को काहे नहीं कह दिए थे?

वह बोले–नहीं हो सीताराम, पैसा कम नहीं था।सात ठो रुपैया महजूद था। लेकिन बूढा बाबा को वैसा करते देखे तो हमरे मन में भी एकठो लोभ आ गया।’

मेरी उत्सुकता जगी कि यह कौन-सा लोभ हो सकता है। वह बोले–‘आज कचहरी में तारीख था। भोर में विदा होने लगे तो पोता बहुत रोने लगा। कहने लगा कि बाजार से हमरे लिए सिलेट-पेंसिल लेते आइएगा। पढने वाला उमर हो गया है। बडा तेजगर है। सो, हो सीताराम, हम सोचे कि दू ठो रुपैया अगर बचा लेंगे तो पोतबा का सिलेट हो जाएगा।’

सन्त जी बहुत खुश हो गए। उनकी आंखों से निर्लिप्तता गल-गलकर बहने लगी।

मैंने एकबार फिर उनकी ओर देखा। वह बडे ही सुन्दर दीख रहे थे। सुन्दर और सन्तुष्ट।

अनुवाद–तारानन्द

नागार्जुन की संस्कृत कविता – तारानन्द वियोगी


जाननेवाले जानते हैं कि नागार्जुन ने हिन्दी, मैथिली और बंगला के साथ-साथ संस्कृत में भी कविताएं लिखीं। अपनी तरुणाई और युवावस्था में उन्होंने जैसा परिवेश, जैसा वातावरण पाया था उसमें कविताई की कसौटी संस्कृत में लिखना थी। संस्कृत मे लिखने के लिए ही प्रोत्साहन था और यश भी वहीं था। कविताभ्यास के तौर पर जो उन्होंने समस्या-पूर्ति के सैकडो छन्द लिखे थे,आज अगर वे उपलब्ध होते तो हम उनकी ऊंची उडानें देख सकते थे। उनके मुंह से कई लोगों ने सप्रसंग ये छन्द सुने होंगे। मैंने भी सुने हैं। लेकिन अब ये कविताएं उपलब्ध नहीं हैं। उनकी रचनावली में संस्कृत की केवल १८ कविताएं संकलित हैं। लेकिन देखनेवाले देख सकते हैं कि इतनी ही कविताएं उनके काव्य-स्वभाव और सौन्दर्य-दृष्टि की लगभग पूरी कहानी कह जाते हैं।

संस्कृत में काव्य-रचना की प्रेरणा उन्हे अपने संस्कृतमय वातावरण से मिली थी। संस्कृत-साहित्य का विधिवत अध्ययन उन्होंने पाठशालाओं में और मर्मज्ञों के सत्संग में किया था।कविता से मिथिला का रिश्ता बहुत पुराना रहा है। यहां हम देखते हैं कि शुष्क-निर्मम तर्कशास्त्रियों ने भी एक-से-एक सुन्दर कविताएं रची हैं जिनका आस्वाद संस्कृतज्ञों की टोली में मुखामुखी लेने का रिवाज आजतक रहा है। दूसरे हम यह भी देखते हैं कि एक ही साथ कई भाषाओं में काव्य-रचना को यहां विशिष्टता का दरजा प्राप्त है। विविध भाषा-ज्ञान की यहां बडी प्रशंसा रही है, साथ ही यह भी माना जाता रहा है कि किसी भाषा-ज्ञान की इयत्ता तभी प्रमाणित होती है अगर उसमें कविता की रचना की गई हो,और वह भी ऐसी, जिसे सराहे जाने योग्य पाया गया हो। हम देखते हैं कि ज्योतिरीश्वर ने भी कई भाषाओं में लिखा और विद्यापति ने भी। तीसरे, यह कि मुक्तक-कविता का बोलबाला मिथिला मे सदा से रहा है।और यहां ‘मुक्तक कविता’ का अर्थ ही है– लीक से हटकर चलना, चीजों को थोडे अलग नजरिये से कुछ इस तरह देखना कि परंपरावादियों को, सत्ताधारियों को वह जरा उकडू लगे। ग्यारहवीं सदी में कर्णाटशासन के महामंत्री श्रीधरदास ने’सदुक्ति-कर्णामृत’ नाम से मुक्तकों का एक विशाल संग्रह तैयार किया था। अब यह साहित्य अकादमी से प्रकाशित है। मिथिला की कविताई का अंदाज हमें इसमें भी दिख जाता है।चौदहवीं सदी के ज्योतिरीश्वर की कविता देखें या सोलहवीं सदी के शंकर मिश्र की देख लें, मिथिला की मुक्तक-परंपरा का एक ठोस चेहरा हमारे सामने उभरकर आता है।

नागार्जुन नेअपनी लोकमुखी परम्परा से बहुत सारी चीजें लीं और उनमें उल्लेखनीय रूप से बहुत सारी नई चीजें जोडीं। अपनी एक कविता ‘वाग्विभूतिः’ में अपनी कविताई का चेहरा चीन्हाते हुए वह कहते हैं–मंगल की कामना से उपजे क्रोध से यह उत्पन्न हुइ है, विक्षोभ का उद्रेक ही इसका रूप है और स्वभाव इसका ऐसा है कि निद्रा को यह चीड-फाड डाले। निश्चय ही यह एक नई चीज है और प्रगतिशील संस्कृत काव्य-परंपरा में नए आयाम जोडती है।

और इसी कविता में, कुछ इस अंदाज में कि ‘मैं तो ऐसा ही हूं’ वह कहते हैं कि मेरा मनोघोटक (मनरूपी घोडा) इसी छान्दसी वाग्विभूति के रस में पगा हुआ बगैर किसी दीनता तथा भ्रान्ति के समूची पृथ्वी पर विचरण करता है। यहां ‘समूची पृथ्वी’ थोडे गहरे अर्थों मे है। यह केवल भूमि या क्षेत्र का ही विस्तार नहीं है,विषयों, सरोकारों और सम्बन्ध-बन्ध का भी विस्तार है। यह दरअसल नागार्जुन का स्वभाव है, जिसके विरुद्ध वह कभी जा नहीं सके। सबको जोडना, सबतक पहुचना। इसीलिए उनकी कविताऔं में स्थूल रूप से भी हमें विस्तार दीखता है। यह विस्तार केवल रूप का ही नहीं, भाव का भी और विचार का भी।

अपनी एक कविता ‘गोविन्दाय नमो नमः’ में शायद पहली बार और शायद आखिरी बार भी उन्होनें अपने आपको गम्भीरता से लेते हुए कहा है कि यात्री नागार्जुन नामधारी इस प्रथितयश कवि को कौन नहीं जानता–यात्रीनाम्ना प्रथितं यस्य यशः को न जानाति–तो यह सच ही कहा है। अवश्य ही वह उन भाग्यशाली कवियों में से हैं जिनकी कविता दूर-दूर तक पहुंची, यानी कि हाशिये पर खडे उस अन्तिम आदमी तक, जिसको केन्द्रविन्दु रखकर वह कविताई करते थे।

संस्कृत में लिखी नागार्जुन की कविताएं विविध विषयों तथा भावभूमियों पर हैं। प्रकृति का गहरा रंग तो इनमें दीखता ही है, वे तमाम चीजें भी इनमें साफ झलकती हैं, जिनके लिए वे मशहूर हैं। एक तो उनकी राजनीतिक कविताई,जिसके लिए वह कहा करते थे कि प्रतिहिंसा ही उनका स्थायीभाव है, दूसरे आमजन से गहरा सरोकार,जिनसे वह अपने आपको आबद्ध,संबद्ध और प्रतिबद्ध बताते थे। नागार्जुन को ऐसे लोग हमेशा प्रिय रहे जो संघर्षधर्मा थे और जिन्होंने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद कुछ सृजनात्मक करने की कोशिश की। अपने ऐसे कुछ समकालीनों पर उन्होंने लिखा है। इसी प्रकार के मिथकपुरुष महामुनि अगस्त्य पर भी उनकी कविता है। फिर, काफी विस्तार में जाकर उन्होंने युगपुरुष लेनिन पर लिखा है। फिर,उनकी कविता अपने प्रिय देश भारत के माहात्म्य पर भी है। कुल मिलाकर ‘बीज में बरगद’ वाली बात इस छोटे-से संकलन में हमें चरितार्थ हुई दीखती है।

राजनीतिक कविता नागार्जुन की खास पहचान रही है। राजनीति के दो रूपों पर अलग-अलग उन्होंने कविताएं लिखीं हैं। एक रूप है, जो जनविरोधी है,जनता के हितों और सरोकारों की न उसे कोई खबर, न कोई चिन्ता है। नागार्जुन सदैव इसके विरुद्ध जाते हैं। दूसरा रूप जनपक्ष से जुडा है। अवश्य ही इसमें भी उनकी अपनी शर्तें हैं पर कुल मिलाकर इसके प्रति उनमें प्रशंसा का भाव है। संस्कृत की दो कविताओं–‘हिंसा-महिमा’ तथा लेनिन-स्तोत्रम्’ में राजनीति के इन दो रूपों पर अलग-अलग उनकी प्रतिक्रिया का आकलन किया जा सकता है।

‘लेनिन-स्तोत्रम्’ संस्कृत की उनकी सर्वाधिक लंबी कविता है जो कि लेनिन के प्रति उनकी श्रद्धा के अनुरूप ही है। २५ श्लोकों मे यहां उन्होंने लेनिन की पृष्ठभूमि,उनकी विचारधारा,उनके कृत्य,उनके अवदान तथा उनके यश का वर्णन किया है।अपनी रूस-यात्रा के क्रम में कवि क्रेमलिन का प्रासाद देखने जाता है, जहां वह स्फटिक की बनी शवाधानी में लेनिन का शव देखता है। लेनिन की आंखों में झांकते हुए उसे यह अहसास होता है कि वे (आंखें) इतनी भास्वर हैं कि किसी सोए हुए आदमी की आंखें हो ही नहीं सकतीं। इसी अहसास से इस कविता का जन्म हुआ है। यहां नागार्जुन कार्ल मार्क्स को ‘मुनियों में सर्वश्रेष्ठ मुनि’कहते हैं और बताते हैं कि लेनिन उनके प्रथम शिष्य हुए और उन्होंने ही उनके विचारों को परम सिद्धि तक पहुंचा दिया। वह कहते हैं कि क्यूबा,अंगोला,वियतनाम आदि देशों में लेनिन का नाम दीप्त है और पृथ्वी के नगरों,ग्रामों,सिकता,हिमानी,वनप्रान्तरों में विराजमान वह, समकालीन मनुष्यों के मन,वचन और कर्म में शामिल होकर विश्वात्मा बन चुके हैं। वह पूछते हैं कि जब इतना है तो क्या इस पुण्यश्लोक की गाथा अन्तरिक्ष में और अन्यान्य ग्रहों पर भी नही गूंज रही होगी?

जार के साथ हुए युद्ध के वर्णन में वह पुराने मुहाबरे को आजमाते हैं और अपेक्षा के अनुरूप ही उसमें एक नई चमक पैदा कर देते हैं।वह कहते हैं–

गगनं गगनाकारं सागरः सागरोपमः।

जार-लेनिनयोर्युद्धं जार-लेनिनयोरिव।।

(आकाश किसके समान है? उसकी उपमा किससे दी जाए? किसी से नहीं। और कौन है वैसा? कहना होगा कि आकाश आकाश के ही समान है। यही बात सागर के साथ लागू होती है और ठीक यही बात उस अनुपम युद्ध के साथ भी लागू होती है जो जार और लेनिन के बीच हुआ था।)

इस कविता में हमें नए विषय-क्षेत्र की तलाश तो दीखती ही है, यथार्थ को साफ-साफ परिभाषित करने की कोशिश भी है । यह विशेषता हमें उनकी अन्यान्य संस्कृत कविताओं में भी दिखाई देती है। यही कारण है कि परंपरागत कवियों की तरह अलंकारवादी शैली को न अपनाकर उन्होंने यथार्थवादी शैली का सहारा लिया। बडे ही सरल शब्दों में बगैर किसी तामझाम के,विना किसी छान्दस जटिलता के, तथ्यों और भावनाओं को उपस्थापित कर देना–निश्चय ही समकालीन संस्कृत कविता के क्षेत्र में नागार्जुन की पहल है। ऊपर से उनकी खूबी यह कि आम कवियों की तरह वह भावुक कवि नहीं हैं, तर्क की कसौटी पर भी उनके आकलन कभी असंगत सिद्ध नहीं होते। ‘लेनिन-स्तोत्रम्’को ही लें। आम पाठक को यह सहज जिज्ञासा हो सकती है कि उस राजनेता में आखिर क्या ऐसी खूबी है कि नागार्जुन उनके गुण गाते नहीं अघाते। यह तो उन्हें बताना चाहिए कि ऐसा क्या था कि वह उनकी अभ्यर्थना में वह स्तोत्र की रचना कर रहे हैं। नागार्जुन बताते हैं। लेनिन की व्यवस्था-वर्णन के क्रम में एक श्लोक आता है–

दरिद्रा लुंठिता भीता ध्वस्तप्रज्ञा निरक्षराः ।

त्वयानुशिष्टास्ते सर्वे स्वयं शासकतां गताः ।।

स्पष्ट है कि ये सारे विशेषण सर्वहारा के लिए प्रयुक्त हुए हैं। दरिद्र,लुंठित,भीत के साथ-साथ वह उसे’ध्वस्त-प्रज्ञ’ भी कहते हैं। जरा इस शब्द पर गौर करें। हित और अहित, सद् और असद् का निर्णय कर सकने में समर्थ बुद्धि को सामान्यतः प्रज्ञा कहते हैं। प्रज्ञा की पराकाष्ठा है–‘स्थितप्रज्ञ’ होना, जिसका गीता में बडा गुण गाया गया है। और, दूसरी ओर स्थितप्रज्ञ के बिल्कुल दूसरे ध्रुव पर खडा शब्द है–ध्वस्तप्रज्ञ।’उसकी प्रज्ञा ध्वस्त हो चुकी थी’ कहते हुए नागार्जुन दरअसल बताना यह चाहते हैं कि उसे अपने दुश्मन तक की भी सही पहचान नहीं थी। और सबसे दिलचस्प तो यह कि एक ध्रुव पर ध्वस्तप्रज्ञता की यह दुर्गत अवस्था और दूसरी ओर उन सबको इस गौरवशाली ऊंचाई तक ले चलना कि वे स्वयंशासकता की स्थिति में आ जाएं।इसे सम्पन्न कर सके थे लेनिन। अतः वह अभ्यर्थना के योग्य हैं क्योंकि यही अन्ततः कवि की अभीप्सित राजनीति है।

लेकिन,राजनीति का एक दूसरा रूप भी है जो अधिक प्रचलित है। इसमें तमाम सारे तामझाम होते हैं, नहीं होता तो बस वह सरोकार जो आमजन के लिए इसे काम्य बनाता है। यह राजनीति व्यक्ति-केन्द्रित होती है। धीरे-धीरे एक थेथर किस्म की निर्लज्जता इसमें घर करती जाती है, छिपकर घी पीने के लिए कंबल की जरूरत खत्म होती जाती है, बाद को छिपने की भी जरूरत नहीं रह जाती। विरोध हो तो उसे अनसुना किया जाता है। फिर भी विरोध कायम रहे तो उसे कुचल दिया जाता है। तानाशाही की यह राजनीति दुर्बल रहे तब भी, और सबल रहे तब तो और भी,क्या चेहरा अख्तियार करती है, इसका बहुत ही प्रामाणिक चित्र हमे नागार्जुन की कविताओं में मिलता है। इसकी सबलता के कारनामों पर उन्होंने एक-से-एक जबर्दस्त कविताएं लिखीं। ऐसी अधिकांश कविताएं आपातकाल के दौरान और उसके तुरंत बाद लिखी गईं। ये हिन्दी में तो हैं ही, मैथिली में भी हैं और संस्कृत में भी। अपनी हिन्दी कविता की नायिका ‘हिटलर की नानी’ को वह संस्कृत में ‘हिंसा देवी’ कहते हैं। उसकी अभ्यर्थना मे उन्होंने ‘हिंसा-महिमा’ लिखी है।

‘हिंसा-महिमा’ काफी लोकप्रिय कविता रही है। इसमें उन्होंने हिंसा देवी को ‘महाकाल का सहोदर’ बताते हुए प्रणाम निवेदित किया है और बडाई की है कि उसकी जिह्वा शोणित पीते-पीते अबतक भी तृप्त नहीं हुई है। वजह यह कि आम आदमी की तरह उसकी एक जिह्वा नहीं,हजारों जिह्वाएं हैं। महत्वाकांक्षा ही तो किसी को हिंस्र बनाती है। स्थितियां बताते हुए वह कहते हैं कि आज कोई ‘भुक्ति’ (सम्पन्नता,सफलता)पाना चाहे या ‘मुक्ति’ (मृत्यु) , हिंसा देवी की इकलौती कृपा के बगैर कुछ भी नहीं हो सकता, क्योंकि हालात ये है कि साक्षात यमराज भी बेचारा केवल उसी का प्राण-हरण करके संतुष्ट हो जाने को बाध्य है, जिसे हिंसा देवी ने सूंघकर (अर्थात नालायक समझकर) थूक दिया हो–‘यमस्तु हरते प्राणान् त्वयैवाघ्राय थूत्कृतान्’। यह दरअसल उत्पीडन की पराकाष्ठा का चित्रण है । नित्य शोणित पीकर भी अतृप्त रहनेवाली यह महाकाल की सहोदर ध्वंसस्तूप पर ही विराजमान होकर संतुष्ट हो सकती है,ऐसा कवि का आकलन है।

यह कविता उन्होंने १० मार्च १९७६ को लिखी थी। लेकिन हमें साक्ष्य मिलता है कि कविता लिख चुकने के बाद भी वह इसके आवेग से मुक्त नहीं हो पाए। ११ मार्च को उन्होंने फिर उसमें एक पंक्ति जोडी। उसमें हिंसा देवी का वंशवृक्ष दिया गया है। हिंसा देवी की प्रवृत्ति और उसके कृत्यों को देखकर उन्हें लगता है कि नहीं, ऐसी दारुण वस्तु मनुष्य की पैदाइश नहीं हो सकती। मनुष्यता पर नागार्जुन को बहुत भरोसा है। कितना भी गिर जाए,मगर मनुष्य इस हद तक नहीं गिर सकता। वह बताते हैं कि विषमता ही इस देवी की मां, लोभ ही इसके पिता और क्रोध ही इसका भाई है। एक कोमलांगी बहन जरूर है उसकी, मगर वह तो उसकी दुश्मन है। कविता के इस अंश में हम काव्यानुभूति को आक्रोश में अन्तरित होने का दृष्टान्त पा सकते हैं।

मगर नागार्जुन थे कि इतना लिख जाने के बाद भी कविता का आवेग उनपर से नहीं उतरा। जो लोग उन्हें निकट से जानते हैं, उन्हें पता है कि कविता का आवेग अक्सर लम्बे समय तक उनके भीतर बना रहता था। इस आवेग का सृजनात्मक उपयोग भी वह करते थे और उससे निकलने के तरीके भी उन्होंने इजाद कर लिए थे। अस्तु। १५ मार्च १९७६ को उन्होंने इसमें एक और पंक्ति जोडी।

नागार्जुन की कविता का स्वभाव है कि वह हमेशा एक निष्पत्ति तक पहुंचती है–चाहे वह किसी स्थूल विषय पर लिखी गई हो या फिर क्षणमात्र-व्यापी किसी तरल अनुभूति पर। क्षणमात्र की अनुभूति भी यदि नागार्जुन के हाथ लगे तब भी वह उसे कहीं-न-कहीं पहुंचाकर ही दम लेनेवाले कवि हैं। यह स्वभाव उन्हें एक बडा कवि बनाता है और ऐसा कवि,जो हमारे जीवन के काम आ सके। इसी अर्थ में वह एक प्रतिबद्ध कवि भी हैं।

१५ मार्च को उन्होंने यह पंक्ति इसमें जोडी–

कर्णाज्जलं जलेनैव कंटकेनैव कंटकान् ।

हिंसयैव हि हिंसाऽपि तदौपम्येन नश्यति ।।

(कान में अगर पानी चला जाए तो और अधिक पानी डालकर ही उसे बाहर निकाला जाता है। कांटा अगर चुभकर भीतर टूट जाए तो उसे कांटे से खोदकर ही बाहर निकाला जाता है। हिंसा का प्रतिकार भी अगर हम करना चाहते हों तो वह समरूप हिंसा से ही संभव हो सकता है।)

यहां दूसरी एक बात गौर करने लायक यह भी है कि जो दृष्टान्त यहां उन्होंने दिए हैं वे आम आदमी के जीवन के हैं, जो नदियों-तालाबों मे नहाते हैं और खेतों-कारखानों में काम करते हैं। वरना,सुसज्जित बाथरूम में नहाकर, ब्रान्डेड कंपनी के जूते पहनकर कार में घूमनेवालों के न तो कान में पानी जाएगा और न ही पैर में कांटे चुभेंगे। उन्हें हिंसा का प्रतिकार भी तो नहीं करना है, वे तो उसी में शामिल हैं।

प्रायः इसी कालखंड की लिखी उनकी एक और कविता है–‘कुमार-लीला’ । इसमें शिव-पार्वती के प्रणय से उत्पन्न दो कुमारों–कार्तिकेय और गणेश–की लीला का वर्णन किया गया है। खेल-खेल में वे यूं करतब दिखाते हैं कि उनके फेंके गेंद करोडों शिखरों को स्पर्श करते हुए कुछ इस तरह भागते हैं कि धावन-कला की माहिर शतद्रु (सतलज) भी लज्जित हो जाती है। यह कविता पढते हुए लोगों को उन दिनों के राजकुमार के करतब याद आ सकते हैं।

अपने देश भारत की प्रणति में नागार्जुन ने ‘देश-दशकम्’ की रचना की। इस कविता में उन्होंने देश के प्रति बडी ही भावनात्मक कृतज्ञता ज्ञापित की है। कविता पढते हुए मुझे बार-बार उनकी कही वह बात याद आई–भारत या बिहार मेरे लिए अमूर्त है। मूर्त है तो मात्र वह स्थान,जहां हम निवास करते हैं।‘ (‘तुमि चिर सारथि’ में उनका एक कथन) वस्तुतः सच भी तो यही है कि वे ही स्थान, वे ही लोग,जो हमारे सम्पर्क-सामीप्य में आते हैं, वे ही वस्तुएं जिनसे हम किसी-न-किसी तरह जुडे होते हैं, हमारे मन में बसे देश का निर्माण करते हैं। एक सुनिश्चित चौहद्दी का क्षेत्र हमारा देश है, मगर उसकी अभिव्यक्ति हमारी चेतना मे बसी मूर्ति से होती है।वह कहते हैं—

नाना-नदी-नद-शतानि शिरा यदीयानाना-विहंग-विरुतानि गिरा यदीया

कश्मीर-कूर्म-सुषमा हसितिर्यदीयातत् पादयोःप्रणतिरस्त्वियं मदीया

लेकिन इसकी प्रतिमा जो कवि के मन में विराजमान है, वह यह है–

गोधूम-शालि-यव-मुग्द-तिलादिपुष्टा

मध्विक्षु-गव्य-मसृणा सुखिता स्वतंत्रा

क्षीरोदकीभवदनेक-विभाग-युक्ता

तिष्ठेत् सदा मनसि मे प्रतिमा त्वदीया

(हे देश,मेरे मन में विराजमान तुम्हारी प्रतिमा सदा-सर्वदा आबाद रहे, जो गेहूं-चावल-जौ-मूंग-तिल आदि खाद्यान्नों का भोग कर पुष्ट हुई है और शहद-ईख-दूध-दही-घी-आदि चीजें जिनसे न जाने कितने-कितने पक्वान्न तैयार होते हैं — इन सब चीजों ने जिसे सुख और स्वतंत्रता की चेतना प्रदान की है।)

उनकी एक कविता मिजोरम पर है, एक डल झील पर है, मगर उनकी कविता डालर पर भी है और भारत-भवन पर भी है। ‘डालराः’ कविता में वह कहते हैं कि यहां डालर तो सोने का अनार है, जिसकी सुन्दरता का क्या कहना। मगर, इसमें आश्चर्य करने की कोई बात नहीं क्योंकि हवाई जहाज में सफर करनेवाली जूएं और लीखें भी तो योगिनी की हैसियत पा ही लेती हैं। हवाई सफर करनेवाली सम्भ्रान्त महिलाओं के बालों में निवास करनेवाली जूओं के प्रसंग से वह डालर की औकात तौलते हैं। गौर करना चाहिए कि इस तुला-प्रक्रिया में भी एक ‘देश’ है। वह किसका देश है?खेतिहर-मजदूरों का, भूखे-नंगों का और आक्रोश से फट रहे नौजवानों का। लेकिन दूसरी ओर देखिए। इन भूखे-नंगों की पीठ,पेट और सिर पर क्या लदा है? वह बताते हैं कि ‘भारत-भवन’-जैसी महाविशाल आकृतियां इन पर लाद दी गई हैं–

कृषकाणां श्रमिकाणां यूनां क्षुत्क्षाम-कण्ठानाम् ।

पृष्ठे जठरे शिरसि च भारत-भवनम् मया दृष्टम् ।।

नागार्जुन को हमेशा संघर्षशील व्यक्ति प्रिय रहे हैं। संघर्ष को जिसने जीया है वही इसकी महत्ता समझ सकता है। इसे नागार्जुन बखूबी समझते हैं। ऐसे लोगों के प्रति उनमें सम्मान तो दीखता ही है, उसकी सफलता के लिए शुभाशंसा भी होती है। यही वजह है कि उनके निर्बल से निर्बल चरित्रों को भी हम कभी हताश होते हुए नहीं देखते। घना अंधकार हो तब भी कहीं से रोशनी का एक कतरा दीख ही जाता है। मिथकों से भी ऐसे लोगों को वह ढूंढ लाते हैं और उनका उत्साह देखना हो तो ऐसी कविताएं देख लें। एक कविता उन्होंने ‘महामुनि’ अगस्त्य पर लिखी है। कहा है–

लक्ष्मीः प्रतीक्षते विष्णुं

बहिरागन्तु-मुद्यतम् ।

सागरं चुलके कृत्वा

सुखं शेते महामुनिः ।।

(सूखे सागर को त्याग कर लक्ष्मी बाहर निकल आई हैं और अब बाहर निकलने को उद्यत आलसी विष्णु का इन्तजार कर रही हैं। और इधर यह महाशय अगस्त्य हैं कि चुल्लू में समुद्र को पीकर आराम की नींद सो रहे हैं।)

प्रसंगवश, यहां मुझे श्रीधर के ‘सदुक्ति-कर्णामृत’ में संकलित एक सहस्राब्दी पहले की मिथिला की एक सगोत्रीय कविता याद आ रही है। इसमें भी जरा विष्णु की दुर्दशा देख लें–

लक्ष्मी-पयोधरोत्संग कुंकुमायितो हरेः ।

बलिरेष स येनास्य भिक्षा-पात्रीकृतः करः।।

(विष्णु के जो हाथ केवल लक्ष्मी के स्तन पर फिरने के अभ्यस्त थे और इतने कोमल तथा सम्भ्रान्त थे कि कुमकुम की लाली से लाल बने रहते थे; धन्यवाद हो उस बलि का, जिसने इन हाथों को भिक्षापात्र की तरह फैलाने को मजबूर किया।)

अस्तु। यह संघर्ष की महत्ता ही है कि नागार्जुन ने अपने कनिष्ठ साहित्यकार पं० गोविन्द झा की प्रशस्ति में यह पंक्ति लिखी–

निर्भीकाय वरेण्याय पैशुन्य-ध्वंस-कारिणे।

स्वतेजसैव दीप्ताय गोविन्दाय नमो नमः।।

अलंकारवादी लोग यहां श्लेष ढूंढेंगे। ढूंढें। मगर तब भी तो चरित्र की विराटता उभर ही आएगी। वरना, नाम अगर कुछ और होता तो क्या इससे तथ्य भी बदल जाते? अपने समकालीन कवि-मित्र त्रिलोचन की प्रशस्ति में उन्होंने लिखा–

भूतलं सुतलं येन पदाभ्यामेव संभृतम् ।

सूर्याच्चन्द्रमसौ श्रान्तौ धरिणी हि सुखमास्थिता।।

(सूर्य और चन्द्रमा चलते-चलते थक जा रहे हैं। पर,यह पृथ्वी है कि बडे आराम से आस्थित बनी है। क्यों? क्योंकि त्रिलोचन ने अपने पावों चलकर इसे नापा है।) श्रद्धा की पराकाष्ठा ही तो इसे कहा जाएगा।

नागार्जुन ने अपनी कविताओं में गुरु-कृपा का बखान भी किया है और विद्या की देवी सरस्वती की प्रार्थना भी की है। पर क्या मांगा है उन्होंने देवी सरस्वती से?मांगा है– लुनातु जन-मानसाद् विमति-तन्तु-जालावलीः‘ — कि आमजन के मन से विमति के जाले साफ करो ताकि वे ठीक-ठीक समझ सकें कि कौन दुश्मन है, कौन दोस्त !

 

।।गोनू झाक गीत।।

 

गुनियां देखलहुं गे मैया,

निरगुनियां देखलहुं गे

एके बेर मरि क’ हम सौंसे

दुनियां देखलहुं गे।

 

टाका के सब यार एतय छै

अतमा के नहि यार

अही भांज मे सब लागल

जे कहुना दांव सुतार

महफिल देखलहुं गे मैया,

हम तहसिल देखलहुं गे

स्वारथ के सब सांप, करैए

सहसह देखलहुं गे।।

 

जिनगी भरि जे संग चलल छल

सेहो अन्त मे छोडय

जकरा ले’ हम की ने केलहुं

सैह हृदय कें तोडय

गौंओ देखलहुं गे मैया

हम घरुओ देखलहुं गे

एके बेर मरि क’ हम मैया

तोरो चिन्हलहुं गे।।

।।जाति-धरम के गीत।।

 

यौ भाइजी किए लडै छी जाति-धरम के नाम पर

घुरियौ अप्पन ठाम पर।

 

एक्के चान,सुरुज आ तारा

एक्के धरती मांक सहारा

जल मे किसिम-किसिम के मोती

लेकिन, एक्के कूल-किनारा

भाइजी, एके बात लागू छै अल्ला-राम पर।।

 

जेहने हमरा मुंह के बोली

तेहने बहिना तूं हमजोली

दिल मे प्रीत हमर जै रॅग के

तेहने तोर हृदय के होली

बहिना, ताजिनगी हम रहब संगहि अइ धाम पर।।

 

सबके मिलने धरती सुन्दर

सबके टुटने चालि छुछुन्दर

धारा अलग बहय तॅ नदिया

सब मिलि जाय तॅ बनय समुन्दर

भाइजी अतमा देखू, जुनि भरमाबू चाम पर।।

।।भैया जीक गीत।।

 

भैया सौंसे जनम गमौलनि सुखक तैयारी मे

नून-हरदि-तरकारी मे।

 

भैयाक नेनपन पढिते बितलनि

तहिना गेल जुआनी आधा

भैया रन-बन खूब बौएला

जिनगी लागनि बाधे बाधा

कहुना नोकरी किनलनि जथा बेचि पैकारी मे।।

 

भैया बड-बड पाइ कमौलनि

बहु-बेटा कें खूब खुआओल

गां मे बडका महल बनौलनि

लोकक हिरदय सांप लोटाओल

लेकिन, चैन-निन्न सब बिला गेलनि बटमारी मे।।

 

भैया वृद्ध भेला तन कांपय

भैया राम-नाम मे लगला

बेटा सब अबंड बहरेलनि

सुख के स्वाद ने पाबय सकला

अहिना जमराजक घर चलला महा लचारी मे।।

 

भैया सौंसे जनम गमौलनि सुखक तैयारी मे

नून-हरदि-तरकारी मे।।

 

%d bloggers like this: