Archive for the ‘नंदिनी पाठक झा’ Category

दिल की जमीं

हैं नहीं अनुकूल मौसम मन का ,
ठूठ पसरे हुए कुछ पेड़ सी है जिन्दगी |
टीले नुमा पत्थरों का ढेर सा ह्रदय है
है प्यास भावना की , पानी नहीं है ,
पर ,मत डरो सद्भावना की सुखाड़ से ,
सत्य के कुछ आधुनिक हथियार रख
बढते चलो आगे , पसीना पोछ कर ,
“ड्रिल ” करो धरती
झूठ के सब ठूठ पौधों को उखारो
तोड़ दो पत्थर पानी बहा दो
यह शपथ लो माथ में
यह नहीं दुर्भाग्य स्थाई हमारा ,
है असर ऋतू का भी की
सुहाना मंजर नहीं है ,
खोद कर देखो जमी दिल की
हुआ अभी बंजर नहीं है |

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अथक प्रयास

क्षमा करो तुम्हे छेड़ा ,
मेरा उद्देश्य युद्ध नहीं
मैं निरुद्द्येश दौड़ती हू |
युद्ध प्रेमियों के पीछे
उसे पकड़ कर पटकना ,
मेरा उद्देश्य नहीं
मैं निरुद्देश्य दौड़ती हू |
और दौड़ते दौड़ते थक कर
सर पटक लेती हू किसी मंदिर के चबूतरे पड़ ,
यह क्रिया अनवरत करती हू अथक
निरंतर अथक प्रयास के बाद
थक कर –
पूछती हू-
इश्वर और कब तक ?
मिलता है प्रश्न का उत्तर ,
माथे की नसों की फरफराहट दे रही है मुझे
पृथ्वी पर शांति मय जीवन चक्र की आहट ,
मन कहता है दौड़ते रहो बस दौड़ते रहो
सांस जब थोड़ी बचेगी इश्वर स्वं कहेंगे सब कुछ ,
अभी कुछ मत कहो
थोडा सहो और दौड़ते रहो |

जिन्दगी शहर की

जिन्दगी शहर की ,
हर पहर कहड़ की
चाखिये तो अमृत
और असर जहर सी |
समझते नहीं जो –
हैं निर्दय
शहर तो बस पेट है
है गाँव ह्रदय |

छीटे मनोरथ के

मैं सफ़ेद ,है मुझे खेद |
हूँ क्लांत , मलिन, सुस्त,नीरस |
तू खुश मिजाज ,बहुरंगी
रंगों से चूता रस
कुछ रस के छीटे पड़े मनोरथ पर मेरे
मैं बेकार हुई ,
तू ठहरा रंगीन ,
मैं धब्बेदार रही |

आसमा से

उसने ठान ली है आसमा से चाँद लेने की ,
मुझे कंधे लगा दो ,
ज़रा उपर उठा दो |
हाथ मेरे चाँद आए ना आए ,
दर्द कन्धों की गवाही तो करेगा |

गवाही

चमक चेहरे की .कहती है
की तुमने चाँद निगला है|
अँधेरा मेरे चेहरे की
गवाही इसकी देता है |

अग्निदीक्षा


हम हँसे तो –
हास्य को आंका  गया सिरे से
हम जो रोये तो-
करुण रस पर समीक्षा हो गयी
वीरता विभात्सा  का नृत्य नंगा देख कर ,
हवन मेरी आज तक की
सारी दीक्षा हो गयी |
हम ना हो पाएंगे उतने रौद्र
जितने तुम हुए ,
उस पराये पन कि जय ,
जिसमे परीक्षा हो गयी |
कर लिया सारा इकठ्ठा
तुमने जो करकट दिया
वह भला कब तक ठहरता
आत्मा कि तेज में ?
जल पड़ी बन लौ
कि जीवन अग्निदीक्षा  हो गयी |

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