Archive for the ‘नचिकेता’ Category

भूख बँटे पर

भूख बँटे
पर, जिजीविषा की प्यास
नहीं बाँटूंगा
गर्दन भी काटूंगा
केवल घास नहीं काटूंगा।

निम्बू जैसा ही निचोड़ कर
पिया हमारा ख़ून
नफ़रत की भाषा में लिखकर
मज़हब के मज़मून

बाँटूंगा हर ज़ख़्म
फ़कत अहसास नहीं बाँटूंगा।

उपजाऊ धरती पर
उसने ही खींचा मेड़
और उसी के कब्ज़े में है
जंगल का हर पेड़

बाँटूंगा अंधियारा
महज प्रकाश नहीं बाँटूंगा।

फूलों की चमड़ि उदार
तितली की काटी पाँख
चालाकी से छीनी है
उसने कुणाल की आँख

बदलूंगा भूगोल
सिर्फ़ इतिहास नहीं बाँटूंगा

अगर नीम के पत्तों का
तीखापन
जाए जाग
टैंक, मिसाइल, बम को
लीलेगी भूसी की आग

गोलबंद हो रही
हवा उन्चास नहीं बाँटूंगा
काटूंगा गर्दन भी
केवल घास नहीं काटूंगा।

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दरख्तों पर पतझर

घुला हवा में कितना तेज ज़हर
यह पहचानो

किसने खिले गुलाबों से
उनकी निकहत छीनी
सपनीली आँखों से सपनों की दौलत छीनी
किसने लिखा दरख्तों पर पतझर
यह पहचानो

कौन हमारे अहसासों को
कुन्द बनाता है
खौल रहे जल से घावों की जलन मिटाता है
नोच रहा है कौन बया के पर
यह पहचानो

खेतों के दृग में कितना
आतंक समाया है
आनेवाले कल का चेहरा क्यों ठिसुआया है
किसकी नजर चढ़े गीतों के स्वर
यह पहचानो।

जेहन में

मेरे जेहन में

सुन्दर सपने सी

आती तुम
जैसे पकने पर

शहतूतों में लाली आती

रिसियाए होंठों पर औचक

ही गाली आती

गर्म जेठ की तपिश

छुअन से

दूर भगाती तुम
जैसे मकई के

दाने में दूध उतरता है

कपड़े पर गिरते ही जल-कण

अधिक पसरता है

वैसे ही

साँसों में बनकर

गंध समाती तुम
मेरी आँखों में

है नींद नहीं तुम ही तुम हो

पूजा की थाली में रोली

अक्षत, कुमकुम हो

तृषित हिया की

भूख, प्यास औ घुटन

मिटाती तुम

खुले नहीं दरवाज़े

खुले नहीं दरवाज़े
बाहर कब तक
शांत रहूँ

घर के अंदर
तनिक नहीं हलचल है
आहट है
धड़कन है
साँसें हैं
साँसों की गरमाहट है
होठों की ख़ामोशी का क्यों
तीख़ा दंश सहूँ

घर के बाहर धूल
धुआँ, बदबू, सन्नाटा है
कसक रहा तलवे में चुभकर
टूटा काँटा है
किस ज़बान से
इन दुर्घटनाओं की व्यथा
कहूँ

नीम-निबौरी झरी
गीत कोयल का मौन हुआ
क्रुद्ध ततैये जैसा डंक
मारती है पछुआ
ज़हरीली है नदी
धार में
कितना दूर बहूँ

किसलय फूटी

सूखे तरू में किसलय फूटी

बच्चों के लाल अधर जैसी
मुस्काते गुलमोहर जैसी
फूली है संजीवन बूटी

हरियाली की पायल छनकी
अँखुआयीं यादें बचपन की
सपनों की चिर तन्द्रा टूटी

अब जीवन आँखें खोलेगा
मिहनत की जेब टटोलेगा
जो गयी सदा छल से लूटी।

कमरे का धुआँ

सोचिए
किस दौर में शामिल हुए

खिड़कियाँ खोलीं कि
आएगी हवा
छँटेगा इस बंद
कमरे का धुआँ

क्या खुलेपन से
मगर हासिल हुए

पच्छिमी गोलार्ध से
आकर सुबह
खोल देगी
हर अंधेरे की गिरह

मान यह
संघर्ष से गाफ़िल हुए

क्या न ख़ुशबू
बाँटने के नाम पर
है हरापन चूसने का
यह हुनर

जो बने रहबर
वही क़ातिल हुए। 

उमंगों भरा शीराज़ा

मीठे सपनों-सी
उगती तुम
मेरी आँखों में

गर्म पसीने की
छलकी बूँदों सी ताजा हो
प्यार, हँसी, उल्लास, उमंगों
भरा शीराज़ा हो
हो सुगंध की कंपन
वनफूलों की
पाँखों में

कैलाये गेहूँ की
बाली सी हो गदराई
मंजरियों से लदी हुई
फागुन की अमराई
गुच्छे-गुच्छे
फूल रही
सहजन की शाखों में

छूकर तन-मन का
रेशा-रेशा मुस्कानों से
उम्दा गीतों को रच देती
लय, स्वर-तानों से
मेरी खातिर
तुम हो एक
करोड़ों-लाखों में

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