Archive for the ‘नामवर सिंह’ Category

दोस्त, देखते हो जो तुम

दोस्त, देखते हो जो तुम अंतर्विरोध सा

मेरी कविता कविता में, वह दृष्टि दोष है।

यहाँ एक ही सत्य सहस्र शब्दों में विकसा

रूप रूप में ढला एक ही नाम, तोष है।

एक बार जो लगी आग, है वही तो हँसी

कभी, कभी आँसू, ललकार कभी, बस चुप्पी।

मुझे नहीं चिंता वह केवल निजी या किसी

जन समूह की है, जब सागर में है कुप्पी

मुक्त मेघ की, भरी ढली फिर भरी निरंतर।

मैं जिसका हूँ वही नित्य निज स्वर में भर कर

मुझे उठाएगा सहस्र कर पद का सहचर

जिसकी बढ़ी हुई बाहें ही स्वर शर भास्वर

मुझ में ढल कर बोल रहे जो वे समझेंगे

अगर दिखेगी कमी स्वयं को ही भर लेंगे।

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कोजागर

कोजागर

दीठियों की डोर-खिंचा

(ऊगते से)इंदु का आकासदीप-दोल चढ़ा जा रहा।

गोरोचनी जोन्ह पिघली सी

बालुका का तट, आह, चन्द्रकान्तमणि सा पसीज-सा रहा।

साथ हम

नख से विलेखते अदेखते से

मौन अलगाव के प्रथम का बढ़ा आ रहा।

अरथ-उदास लोचनों में नदी का उजास

टूटता, अकास में, कपास-मेघ जा रहा।

नीर हटता सा

क्लिन्न तीर फटता सा गिरा

किंतु मूढ़ हियरा, तुझे क्या हुआ जा रहा।

पंथ में सांझ

पथ में सांझ

पहाड़ियाँ ऊपर

पीछे अँके झरने का पुकारना।

सीकरों की मेहराब की छाँव में

छूटे हुए कुछ का ठुनकारना।

एक ही धार में डूबते

दो मनों का टकराकर

दीठ निवारना।

याद है : चीड़ी की टूक से चांद पै

तैरती आँख में आँख का ढारना?

धुंधुवाता अलाव

धुंधुवाता अलाव, चौतरफ़ा मोढ़ा मचिया

पड़े गुड़गुड़ाते हुक्का कुछ खींच मिरजई

बाबा बोले लख अकास :’अब मटर भी गई’

देखा सिर पर नीम फाँक में से कचपकिया

डबडबा गई सी,कँपती पत्तियाँ टहनियाँ

लपटों की आभा में तरु की उभरी छाया।

पकते गुड़ की गरम गंध ले सहसा आया

मीठा झोंका।’आह, हो गई कैसी दुनिया!

सिकमी पर दस गुना।’ सुना फिर था वही गला

सबने गुपचुप गुना, किसी ने कुछ नहीं कहा।

चूँ-चूँ बस कोल्हू की; लोहे से नहीं सहा

गया। चिलम फिर चढ़ी, ख़ैर, यह पूस तो चला…’

पूरा वाक्य न हुआ कि आया खरतर झोंका

धधक उठा कौड़ा, पुआल में कुत्ता भोंका।

विजन गिरिपथ पर चटखती

विजन गिरीपथ पर चटखती पत्तियों का लास

हृदय में निर्जल नदी के पत्थरों का हास

‘लौट आ, घर लौट’ गेही की कहीं आवाज़

भींगते से वस्त्र शायद छू गया वातास।

पारदर्शी नील जल में

पारदर्शी नील जल में सिहरते शैवाल

चांद था, हम थे, हिला तुमने दिया भर ताल

क्या पता था, किंतु, प्यासे को मिलेंगे आज

दूर ओठों से, दृगों में संपुटित दो नाल।

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