Archive for the ‘बाबा नागार्जुन’ Category

१९ ६ ९ में श्री रामकृष्ण झा ‘किसुन’ द्वारा सम्पादित ‘मैथिलिक नव कविता” के किछ भाग

                                                                                              परिचय

नाम – श्री बैद्यनाथ मिश्र
ख्यातनाम – “नागार्जुन” (हिंदी संसारमे ) आ’ “यात्री” (मैथिलि जगत मे)

जन्म -१९११ ई.

पैत्रिक वासभूमि – तरौनी (सकरी) जिला -दरभंगा
शिक्षा – मुख्यतः संस्कृत एवं पालिक माध्यमसँ व्याकरण,साहित्य आ दर्शनक (तरौनी ,महिषी,सतलखा -मातृक,गोनौली ,पंचगछिया,काशी,कलकत्ता एवं केलानिया-कोलोम्बो ) |

प्रकाशित रचना – ” नागार्जुन” नामे पुस्तकाकार- युगधारा ,शपथ ,प्रेत का बयान,खून और शोले ,चना जोर गरम(काव्य संकलन ) रतिनाथ चाची, बलचनमा ,नई पौध, बाबा बटेसर नाथ ,वरुण के बेटे ,दुखमोचन(उपन्यास) हिंदी में |
यात्री नामे पुस्तकाकार – चित्रा,पत्रहीन नग्न गाछ(काव्य संकलन),पारो,नवतुरिया,बलचनमा (उपन्यास) मैथिलिमें |
संस्कृतमे -देशदसकम आदि तथा सिंहली लिपि में धर्मालोक शतकम   प्रकाशित |
देशक प्रायः हिंदी आ मैथिलिक समस्त प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकामें कथा,कविता,संस्मरण,व्यंग,एकांकी आदि प्रकाशित |
रचनाक माध्यम – हिंदी,मैथिलि,पाली,संस्कृत, सिंहली,आदि |
विशेष तथाकथित प्रगतिवाद तथा आधुनिक  नव कविताक संधिस्थल पर जनिक रचना नवीन भावभूमिक आरम्भ सूचक मानल जाईछ |

1. नवतुरिए आबओं आगाँ

तीव्रगंधी तरल मोवाइल
क्षणस्पंदी जीवन
एक-एक सेकेण्ड बान्हल!
स्थायी-संचारी-उद्दीपन-आलंबन ….
सुनियंत्रित एक-एक भाव!
परकीय-परकीया सोहाई छई ककरा नहि
खंड प्रीतिक सोन्हगर उपायन ?
असह्य नहि कुमारी विधवाक सौभाग्य
असह्य नहि गृही चिरकुमारक दागल ब्रह्मचर्य
सरिपहुं सभ केओ सर्वतंत्र स्वतंत्र
रोक टोक नहिए कथूक  ककरो
रखने रहू, बेर पर आओत काज
आमौटक पुरान धरिका…..
धर्मं -अर्थ -काम-मोक्ष !

पघिलेओ  नीक जका सनातन आस्था
पाकओं नीक जकां चेतन कुम्हारक नबका बासन
युग-सत्यक आबामे…
जूनी करी परिबाही बूढ़-बहीर कानक
टटका मंत्र थीक,
नवतुरिए आबओं आगाँ!!
वैह करत रुढीभंजन,आगू मुहें बढ़त वैह …
हमरा लोकनि दीअई आशीर्वाद निश्छल मोने ;
घिचीअई टा नहि टाड पाँछा…
ढेकी नहि कूटी  अपनही अमरत्वा टाक ….|

 

आन्हर जिन्दगी !

१.आन्हर जिनगी
सेहंताक टेढ़ासँऽ थाहए
बाट घाट, आँतर-पाँतरके
खुट-खुट-खुट-खुट ….

२ आन्हर जिनगी
चकुआएल अछी
ठाढ़ भेल अछी
युगसंधिक अई चौबट्टी  लग
सुनय विवेकक कान पथिकेँ
अद्गोई-बदगोई

३.आन्हर जिनगी
शांति सुंदरी केर नरम आङुरक स्पर्शसँ
बिहुँसे रहल अछी!
खंड सफलताकेर  सलच्छा सिहकी
ओकर गत्र-गत्रमें
टटका स्पंदन भरी देलकइए |

 

मनुपुत्र,दिगंबर
समुद्रक कछारमें
सितुआक पीठपर
तरंगित रेखाक बहुरंगी आइपन,हल्लुक !
ऊपर अउन्हल आकाश
निबिड़-नील !
नीचां श्याम सलिल वारुणी सृष्टि !
सभ किच्छु बिसरि
तिरोहित कए सभ किच्छु
– अवचेतन मध्य
रहताह  ठाड़ मनुपुत्र ,दिगंबर
ने जानि कती काल
पश्चिमाभिमुख !

 

छीप पर राहऔ नचैत
छीप पर राहऔ नचैत
कनकाभ शिखा
उगिलैत  रहऔ स्निग्ध बाती
भरी राति मृदु-मृदु तरल ज्योति
नाचथु शलभ -समाज
उत्तेजित आबथु-जाथु
होएत हमर अंगराग हुतात्मक  भस्म
सगौरव  सुप्रतिसथिट हसितही हम रहबे
दिअठिक जड़सँ के करत बेदखल हमरा
ने जानि , कहिया ,कोन युग में
भेटल छल वरदान
अकल्प हम रहब बइसल दीप देवताक  कोरमें

 

बीच सड़क पर

बीच सड़क पर
हरिहर-हरिहर घास
तइपर ससरय ट्राम
मने आरिपर डोका
भाद्वारिक ई भीजल-तीतल
चिक्कन -चाकन सनगर बालीगंज
मध्य वक्ष ट्राम लाईनकेर जानउ पहिरने

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जी हाँ , लिख रहा हूँ

जी हाँ, लिख रहा हूँ …
बहुत कुछ ! बहोत बहोत !!
ढ़ेर ढ़ेर सा लिख रहा हूँ !
मगर , आप उसे पढ़ नहीं
पाओगे … देख नहीं सकोगे
उसे आप !

दरअसल बात यह है कि
इन दिनों अपनी लिखावट
आप भी मैं कहॉ पढ़ पाता हूँ
नियोन-राड पर उभरती पंक्तियों की
तरह वो अगले कि क्षण
गुम हो जाती हैं
चेतना के ‘की-बोर्ड’ पर वो बस
दो-चार सेकेंड तक ही
टिकती है ….
कभी-कभार ही अपनी इस
लिखावट को कागज़ पर
नोट कर पता हूँ
स्पन्दनशील संवेदन की
क्षण-भंगुर लड़ियाँ
सहेजकर उन्हें और तक
पहुँचाना !
बाप रे , कितना मुश्किल है !
आप तो ‘फोर-फिगर’ मासिक –
वेतन वाले उच्च-अधिकारी ठहरे,
मन-ही-मन तो हसोंगे ही,
की भला यह भी कोई
काम हुआ , की अनाप-
शनाप ख़यालों की
महीन लफ्फाजी ही
करता चले कोई –
यह भी कोई काम हुआ भला

!

सच न बोलना

मलाबार के खेतिहरों को अन्न चाहिए खाने को,
डंडपाणि को लठ्ठ चाहिए बिगड़ी बात बनाने को!
जंगल में जाकर देखा, नहीं एक भी बांस दिखा!
सभी कट गए सुना, देश को पुलिस रही सबक सिखा!

जन-गण-मन अधिनायक जय हो, प्रजा विचित्र तुम्हारी है
भूख-भूख चिल्लाने वाली अशुभ अमंगलकारी है!
बंद सेल, बेगूसराय में नौजवान दो भले मरे
जगह नहीं है जेलों में, यमराज तुम्हारी मदद करे।

ख्याल करो मत जनसाधारण की रोज़ी का, रोटी का,
फाड़-फाड़ कर गला, न कब से मना कर रहा अमरीका!
बापू की प्रतिमा के आगे शंख और घड़ियाल बजे!
भुखमरों के कंकालों पर रंग-बिरंगी साज़ सजे!

ज़मींदार है, साहुकार है, बनिया है, व्योपारी है,
अंदर-अंदर विकट कसाई, बाहर खद्दरधारी है!
सब घुस आए भरा पड़ा है, भारतमाता का मंदिर
एक बार जो फिसले अगुआ, फिसल रहे हैं फिर-फिर-फिर!

छुट्टा घूमें डाकू गुंडे, छुट्टा घूमें हत्यारे,
देखो, हंटर भांज रहे हैं जस के तस ज़ालिम सारे!
जो कोई इनके खिलाफ़ अंगुली उठाएगा बोलेगा,
काल कोठरी में ही जाकर फिर वह सत्तू घोलेगा!

माताओं पर, बहिनों पर, घोड़े दौड़ाए जाते हैं!
बच्चे, बूढ़े-बाप तक न छूटते, सताए जाते हैं!
मार-पीट है, लूट-पाट है, तहस-नहस बरबादी है,
ज़ोर-जुलम है, जेल-सेल है। वाह खूब आज़ादी है!

रोज़ी-रोटी, हक की बातें जो भी मुंह पर लाएगा,
कोई भी हो, निश्चय ही वह कम्युनिस्ट कहलाएगा!
नेहरू चाहे जिन्ना, उसको माफ़ करेंगे कभी नहीं,
जेलों में ही जगह मिलेगी, जाएगा वह जहां कहीं!

सपने में भी सच न बोलना, वर्ना पकड़े जाओगे,
भैया, लखनऊ-दिल्ली पहुंचो, मेवा-मिसरी पाओगे!
माल मिलेगा रेत सको यदि गला मजूर-किसानों का,
हम मर-भुक्खों से क्या होगा, चरण गहो श्रीमानों का!

यह तुम थीं

कर गई चाक
तिमिर का सीना
जोत की फाँक
यह तुम थीं

सिकुड़ गई रग-रग
झुलस गया अंग-अंग
बनाकर ठूँठ छोड़ गया पतझार
उलंग असगुन-सा खड़ा रहा कचनार
अचानक उमगी डालों की सन्धि में
छरहरी टहनी
पोर-पोर में गसे थे टूसे
यह तुम थीं

झुका रहा डालें फैलाकर
कगार पर खड़ा कोढ़ी गूलर
ऊपर उठ आई भादों की तलैया
जुड़ा गया बौने की छाल का रेशा-रेशा
यह तुम थीं !

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