Archive for the ‘राजकमल चौधरी’ Category

तुम मुझे क्षमा करो

बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।
मुस्कुराहटें मेरी विवश
किसी भी चंद्रमा के चतुर्दिक
उगा नहीं पाई आकाश-गंगा
लगातार फूल-

चंद्रमुखी!
बहुत अंधी थीं मेरी प्रार्थनाएँ।
मुस्कुराहटें मेरी विकल
नहीं कर पाई तय वे पद-चिन्ह।
मेरे प्रति तुम्हारी राग-अस्थिरता,
अपराध-आकांक्षा ने
विस्मय ने-जिन्हें,
काल के सीमाहीन मरुथल पर
सजाया था अकारण, उस दिन
अनाधार।
मेरी प्रार्थनाएँ तुम्हारे लिए
नहीं बन सकीं
गान,
मुझे क्षमा करो।

मैं एक सच्चाई थी
तुमने कभी मुझको अपने पास नहीं बुलाया।
उम्र की मखमली कालीनों पर हम साथ नहीं चले
हमने पाँवों से बहारों के कभी फूल नहीं कुचले
तुम रेगिस्तानों में भटकते रहे
उगाते रहे फफोले
मैं नदी डरती रही हर रात!
तुमने कभी मुझे कोई गीत गाने को नहीं कहा।
वक़्त के सरगम पर हमने नए राग नहीं बोए-काटे
गीत से जीवन के सूखे हुए सरोवर नहीं पाटे
हमारी आवाज़ से चमन तो क्या
काँपी नहीं वह डाल भी, जिस पर बैठे थे कभी!
तुमने ख़ामोशी को इर्द-गिर्द लपेट लिया
मैं लिपटी हुई सोई रही।
तुमने कभी मुझको अपने पास नहीं बुलाया
क्योंकि, मैं हरदम तुम्हारे साथ थी,
तुमने कभी मुझे कोई गीत गाने को नहीं कहा
क्योंकि हमारी ज़िन्दगी से बेहतर कोई संगीत न था,
(क्या है, जो हम यह संगीत कभी सुन न सके!)
मैं तुम्हारा कोई सपना नहीं थी, सच्चाई थी!

१९ ६ ९ में श्री रामकृष्ण झा ‘किसुन’ द्वारा सम्पादित ‘मैथिलिक नव कविता” के किछ भाग-1

 परिचय
नाम – श्री मनिन्द्र नारायण चौधरी
उपनाम – फूलबाबू (गाममे )
प्रख्यात्नाम -राजकमल चौधरी

जन्म – १३ दिसंबर १९२९ ई .
जन्मस्थान – रामपुर (सहरसा) मुदा पिता स्व. पं. मधुसूदन चौधरी महिषी (सहरसा) क निवासी

शिक्षा – १९४७ में मैट्रिकुलेशन ,तत्पश्चात भागलपुरसँ आइ.कम आ गया कालेज सँ  बी. कम
लेखनारंभ-प्रथम कविता शशि उर्वशी (१९५४) वैदेही में प्रकाशित (डा.बालगोविन्द झा ‘व्यथितक’ अनुसार )प्रथम कथा (प्रो. धीरेंद्रक अनुसार ) ‘अपराजिता’  (वैदेही १९५४ में प्रकाशित)

प्रकाशित रचना – विभिन्न हिंदी-मैथिलि पत्र-पत्रिका में प्रकशित कथा,कविता,निबंद्धआदिक अतिरिक्त – नदी बहती थी, मछली मरी हुई,देह गया, शहर था शहर नही था,अरण्यक,एक अनार,एक बीमार,चौरंगी (अनुवाद)
हिंदी उपन्यास -आदिकथा,कथा पराग,आन्दोलन
मैथिलि उपन्यास -कंकावती आ मुक्ति प्रसंग -हिंदी कविता संकलन तथा स्वरंगवा मैथिलि काव्य संकलन प्रकाशित |

मृत्यु – करोनरी अल्क्युजनक  कारणे पटनाकं राजेंद्र सर्जिकल ब्लोक में १९६७ कें

 

     प्रवास

अपने गाछीक
फूल-पात नही चिंहैत छि
बूझल नही अछि
वृक्ष सभक
लोक सभक
नाम बूझल नही अछि
एतेक दिन एही गाममें
अयनां भऽ गेल
मोम जेना कारी सन अयना भऽ गेल
हुनका चिन्हबाक  चेष्टा करि

एखनाहूँ ई सूझल नही
आभहु होइए
एही प्रकृति सँ, एही स्त्री सँ ,एही नदी सँ
अपरिचिते रहि जाइ,एही गाम सँ  धाम सँ
प्रवासी हैबाक सभटा दुःख , सभटा वेदना
हम एकसरे सही जाइ
अपरिचिते रहि जाइ
एतेक दिन एही गाममें अयनां भऽ गेल
मुदा,चिन्हार नही अछी विकालक
एही अन्हार में
अपने घर आङन
अपने घर आङन में चिकरै छि
हम अपने टा नाम
प्रवासी
नगरवासी छी हम
ई उपराग दैत छि
अपने टा गाम
वयः संधि , द्वितीय पर्व 

बाघ-बोनमे बौअयब हम

ककरा संग,लागल साँझ परात

माया मुद्रा,व्यधि व्यथा केर

जब्बर-जब्बर खुट्टा चारू कात

क्रोध नहीं रहल मोनमें बैसल

मातल छुट्टा सांढ—

आब की तोड़ब पगहा ,किएक

मारब बथानमे लात

 

द्रौपदी सँ विरक्ति 

आन्हर घरक अन्धकारमें

आब साप नहीं मारब

तोड़ी देब बरु तेल पियाओल लाठी |

थाकल देहक अन्ध -कूपमे

आब झांप नहीं मारब

कतबो ग्राह ग्रसित कयने हो मातल हाथो |

आन्हर घरक अन्धकारमें

आहाँ साप कटबाउ

अपने देहक पंकिल जंगल पहाड़में

एसकरी बीन बजाऊ |

 

अर्थ तंत्रक चक्रव्यूह

सभ पुरुष शिखंडी

सब स्त्री रासक राधा

सबहक मोनमे धनुष तानिकऽ बैसल

रक्त पियासल व्याधा

कतऽ जाउ? की करू ??

रावण बनि ककर सीताकें हरु ?

सभ पुरुष शिखंडी

सभ स्त्री रसक विकल राधा

कतऽ जाउ? की करू ??

चक्रव्यूह में ककरो भरोस नहि करू

रे अभिमन्यु -मोन

छोरी देश ई चलू बोन

सभ पुरुष शिखंडी

सब स्त्री रासक राधा

सब स्त्री रासक राधा

सबहक मोनमे धनुष तानिकऽ बैसल

रक्त पियासल व्याधा

पितृ-ऋण

पिता थे–एक सार्थक शब्द

और, हमने शब्दों की सार्थकता को

अविश्वसनीय बताया।

जीते थे पिता मूल्यों में

अभिव्यक्ति में, नीति में,

अर्थवत्ता में।

हम जीवन धारण करते हैं केवल

व्यक्तित्व की निरर्थकता में।

पितृ-ऋण से मुक्ति का दूसरा कोई उपाय हमारे पास नहीं है

कभी होगा भी नहीं

होगा भी नहीं।

जेठ मास का गीत

हेठ बरखा जेठ हे सखि हेठ बरखा–कितनी दूर से स्मृति मे

आ रहे हैं

इस प्राचीन बारहमासे के और भी प्राचीन शब्द…लोक-शब्द

लेकिन मैं किस जगह हूं

जेठ की इस अग्नि-धूसर दोपहरी में

इस वृद्ध जर्जर पाकड-वृक्ष की छांह में क्यों अटका हूं मैं

 

जेठ हे सखि हेठ बरखा….लेकिन

अब कभी हेठ नहीं होगी, अब कभी नहीं

होगी बरखा

धरती का फटा हृदय

फटा ही रह जाएगा और उस गांव में अब कोई नहीं लेगा

मेरा नाम, कोई नहीं पूछेगी कोनटे के पास

खडी होकर

कबतक आएंगे फूलबाबू

कबतक शुरू होगा फिर से डाकबंगले पर शतरंज का खेल

कबतक…..

लेकिन अब कोई नहीं पूछेगा इस अग्नि-जर्जर

दोपहरी में मेरे हालचाल

धरती का फटा हृदय नहीं जुडाएगा अब कभी।

 

मुझसे कितना ज्येष्ठ  कितना अनुभवी,

कितना ही चतुर-चालाक है

यह जेठ मास

और, मैं कितना तुच्छ कितना छुद्र  कितना आन्हर-बताह

कि आषाढ-सावन की प्रतीक्षा

नहीं है मुझे

मुझमें नहीं है इतना भी आन्तरिक आग्रह कि

हेठ हो बरखा

कि तुम कुएं पर तुलसी-गाछ के समीप आकर खडी होओ

मेरे लिए, कि बीत जाए

यह चतुर-चालाक जेठ  और बरखा

ऋतु आरंभ होने के उपरान्त

हम गांव लौट आएं।

 

ऐसा कोई आग्रह नहीं है मुझमें अब

सारे आग्रह स्वप्न व्यथा-कथाएं शेष हुईं।

अब मैं हूं और यह पाकड-वृक्ष है

और कुछ भी नहीं है  कहीं नहीं  कभी नहीं

किसी भी तरह कोई नहीं

कोई नहीं अभी मेरे लिए

मैं हूं और यह पाकड-वृक्ष है  मृत  मलिन  उन्मन

मेरी तरह।

कोशी-किनारे की सांझ

आठ दस पन्द्रह जाने कितने पंछी परिचयहीन

इस तरह मेरे सिर मेरी आंखों, मेरे थके हृदय को छूते

जैसे उलाहना कोई देते मुझको।

इस तरह मेरे प्रेम मेरी घृणा मेरे पके भय को छूते

आठ, दस, पन्द्रह, जाने कितने पंछी परिचयहीन

उडे जाते हैं।

 

थोडी ही देर बाद  इस नदी  इस वन-प्रान्तर के चारों ओर

फैल जाएगा घना अंधकार

जाने कितने पंछी  कितने शब्द कितनी इच्छाएं परिचयहीन

डूबी जाती हैं मेरी ही आखों में।

उड जाऊं इन्हीं पंछियों के साथ, अनन्त आकाश में

उड जाऊं, इतनी शक्ति नहीं है  हे कवि

अब मेरी पांखों में।

डूबे जाते हैं मेरी ही आंखों में ये पंछी  यह समूचा मुक्त

नील ताराविहीन आकाश….

यह निर्जन एकान्त सहन करने का है

केवल मुझे अभ्यास…..

राजकमल चौधरी की मैथिली कविताएं : गांव के बारे में अनुवाद–तारानन्द वियोगी

प्रवास

अपने ही बगीचे में लगे

पेड-पौधे, फूल-पात पहचानता नहीं

जानता नहीं हूं वृक्षों के, लोगों के नाम

इतने दिन इस गांव में आए हो गए

मन जैसे काला-कलूटा आईना हुआ

कि इन्हें जानने-पहचानने की चेष्टा करूं

यह सूझा नहीं।

अब भी लगता है कि

इस प्रकृति, इस स्त्री, इस नदी से

अपरिचित ही रह जाऊं इस ग्राम से, धाम से

प्रवासी होने के सारे दुख, सारी वेदनाएं

अकेला मैं ही सह जाऊं, अपरिचित रह जाऊं।

इतने दिन इस गांव में

आए हो गए

लेकिन, परिचित नहीं हुआ त्रिकाल के

इस अंधकार में;

अपना ही घर-आंगन।

अपने ही घर-आंगन में पुकारता हूं

बस अपना ही नाम

प्रवासी,नगरवासी हूं–यह उलाहना

देता है मुझे अपना ही गांव

अपना ही गांव।

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