Archive for the ‘रामकृष्ण झा ‘किसुन’’ Category

१९ ६ ९ में श्री रामकृष्ण झा ‘किसुन’ द्वारा सम्पादित ‘मैथिलिक नव कविता” के किछ भाग

परिचय

नाम-श्री रामकृष्ण झा ‘किसुन ‘

पितृनाम -पंडित नागेश्वर झा (स्वर्गीय)

पता – सुपौल(पो.)जिला -सहरसा |

जन्मतिथि – १ जनवरी १९२ ३ ई .

योग्यता – नियमित विद्यालयी अध्ययन –संस्कृत व्याकरण  तथा साहित्यिक | नियमित स्वाध्याय मुख्यतः हिंदी आ उर्दू साहित्यिक पछाति मैथिलिक |स्वतंत्र रुपे संस्कृत हिंदी आ मैथिलि परीक्षा सबमें सम्मिलित भऽ उपाधि सभक संग्रह,जे प्रवृति एखनधरि विद्यमान |

क्रमबद्ध लेखानारम्भ  – १९३७सँ हिंदीमें | प्रथम प्रकाशित रचना “कौन है वह ?” कविता,बालक (१९३९ ई ) मे |

१९४१ सँ मैथिलीमे | प्रथम प्रकाशित रचना  ” शिशु सँ ” कविता,मिथिला मिहिर (१९४६ ई ) मे

प्रथम प्रकाशन -(पुस्तक) हिन्दी क “आओ गायें”

बालोपयोगी कविता संग्रह (१९४९ ई) “इन्द्रधनुष “(१९५० ई ) प्रौढ़ कविता संग्रह |

मैथिलिक ‘आत्मनेपद ‘ कवितासंग्रह १९६३ ई मे |

प्रकाशाधीन – (अप्पन )१ साहित्यिक निबंध  निचय २. क्रमश: (कविता संग्रह ) ३. स्वयंवर (कथा संग्रह ) ४.समाज (उपन्यास) ५.  विविधा(कथा-काव्य) तथा अनेक गद्य ,पद्य आदि संकलन |

विशेष – कोशी दर्पण,चेतना ,सौरभ, प्रच्यप्रभा,स्कूल पत्रिका, संकल्प आदिक संपादन,

पत्रकार आ विभिन्न सामाजिक , साहित्यिक आन्दोलन  एवं संघटन सबसँ सम्बद्ध, साहित्य आ साहित्यकार दुहुक रचनामे संलग्न सम्प्रति विलियम्स  बहुद्देशीय विद्यालयमे अध्यापन |

वृत्ति- अध्यापन

रूचि – पढ़यबु सँ बेसी पढ़बे मे , एकांत चिंतनमे ,भ्रमण, संगठन आ आयोग मे |

मनुक्ख जिबेत अछि

के कहलक जे मनुक्ख मरि गेल ?

ई कथन फूसि थिक

ओ जीबैत अछि

जीबैत रहैत अछि

मृत्युक तमित्रा जीवनक सूर्यकें

प्रतिदिन मरियोकऽ असफल रहैत अछि

सभ दिन भोरकें

अन्धकार चीरि कऽ

होइत अछि असंदिग्ध

ज्योतिक विस्फोट

ऐतिहासिक सत्यथिक

जिनगीक चोट |

मनुक्ख थिक सत्य

मनुक्ख थिक…. शिव सुंदर

मनुक्ख थिक तथ्य

तैं ओकर शिल्प,ओकर सृष्टी

गद्य,पद्य ,चित्र आदि  रचना  समष्टि

पॉइंट आफ  आर्डर

फ़ाइल परक नोट

जुलूस महक नारा

चुनाव कालक वोट

इजलासपरक जजमेंट

दस्तावेजक ड्राफ्ट

बाप-पित्ती,बहु-बेटी

सभकें लिखल पत्र

एक-एक शब्द

अर्थ

एक-एक अक्षर

रुदन-हास्य-गानकेर

एक-एक स्वर

समाज आ कि व्यक्ति

चाहे हो अस्वीकृति

खाहे स्वीकार

बनि गेल सर्व जनीन

विस्वक संपत्ति

जिनगीक आगि में

मृत्यु जरी गेल

के कहलक जे मनुक्ख मरि गेल?

(ई कविता ‘राजकमल’ क जीवनकाल में लिखने छलहुं आ आब राजकमलक स्मृतिकें समर्पित अछी)

 

जिनगी : चारिटा द्रिष्टिखंड

जिनगी थिक

टिकट ट्रामक

अपन स्टापेज धरिक

यात्रा कऽ

ओकर उपभोग कऽ

चुपचाप

दैत’छि लोक जाकर फेकि |

जिनगी थिक

चून देल,चुनौल

दुहु हाथक बीच पौने

रगर-थापर

तमकुलकेर ज़ूम

ठोरमे किछु काल जाकर राखी

जाकर भोगी

थुकड़ी दैत’छि लोक

‘पच’ दऽ फेकि

जिनगी थिक

एक रचना

जे अपन शीर्षक सहित

छपी जाइछ

जं संपादक रहऽथि दहीन

तखन हैत न मेष अथवा मीन

नहीं तं अस्वीकृत  बनाय सखेद

प्रेषके लग होइछ पुनि  दिसपैच |

 

जिनगी थिक

नऽव् कविता

किछु गोट्यके

जाकर होईछे

किछु गोट्य के नऽहि

भावक बोध

बोध्गम्यो  होइत जे

कहबैत अछी दुर्बोध

उग रहा सूरज … रामकृष्ण झा किसुन (१९४९ )

उग रहा सूरज कि मिटती जा रही है रात
जा रही है रात मिटती
फट रही तम की जवनिका
और अब तो लड़खड़ाते पाँव है इस अंधियारी के
उजाला आ रहा है |
: : :

मिटेगी यह विषमता
सब एक होंगे आज के मानव
कि बस अब एक- से सुख दुःख बाँटेंगे
सभी होंगे सुखी औ संतुष्ट जीवन
रह न पायेगा कहीं कोई कभी अब
मनुज विह्वल, वस्त्रहीन, विपन्न
या कि निर्धन, निरानंद, निरन्न
और अब इन मंदिरों के देवता से
मस्जिदों गिरिजाघरों के
गौड या अल्लाह से ऊँचा रहेगा
हाड़ मांसों का बना यह मनुज सर्वश्रेठ
लिख रहा पूरब क्षितिज पर
नए युग का मधुर अरुणिम प्रात
लाल स्याही से यह कुछ इस तरह की बात
उग रहा सूरज की मिटती जा रही है रात |

‘किसुन जी’ क दृष्टि आ मूल्य-बोध

सुपौल स प्रकाशित ‘चेतना ‘ नामक हिंदी पत्रिकाक प्रवेशांक क सम्पादकीय में किसुन जी लिखने छथिन –
एक दीपक की ज्योति से अनेक दीपकों को ज्योतिर्मय करना अपने देश की प्राचीन परंपरा है| ‘दीप से दीप जले’ वाले सिद्धांत के आधार पर व्यक्तिगत चेतना को सामाजिक चेतना और इस प्रकार युग-चेतना का प्रतिमान बनाने की दिशा में सांस्कृतिक धरातल पर रचनात्मक प्रवृति को उद्बुद्ध कर साहित्य के माध्यम से राष्ट्र- कल्याण की भावना जन-जन में भरने की योजना का कार्यान्वयन हमारा लक्ष्य है | आज के सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न की दृष्टि से हमें जिस विषय को समाहित करना है वह है मनुष्य की यथार्थ चेतना का सम्यक विकास करना | इसके लिए साहित्य एक सबल साधन ही नहीं, महान माध्यम भी है, किन्तु साथ ही आधुनिक मनुष्य को उसके विराट सांस्कृतिक सन्दर्भ में समझे- परखे बिना तथा स्थायी मानव मूल्यों को अधुनातन परिवेश में खोजे बिना आज के साहित्य-चिंतन का वास्तविक उद्देश्य पूर्ण नहीं हो सकता |

सौजन्य- श्री मोहन भरद्वाज द्वारा लिखित पुस्तक

स्व. रामकृष्ण झा ‘किसुन ‘

            मृत्यु

एकटा शांतिदायक सत्य

जे चिरैत जकाँ तीत बुझाइछ

क्यो पीबय नहि चाहैत अछि

पीबऽ पडैच  सभकें मुदा

सभ यंत्रनाक सभ बीमारीक

एकमात्र महौषधि

सभक परम मित्र

कही नहि कखन , कतय

ककरा  भेटि जयतैक |

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